रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक पहल, कीव पहुंचे जयशंकर

यूक्रेनी विदेश मंत्री सिबिहा और राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात, भारत बोला—शांति के लिए किसी भी तरह की मदद को तैयार मोदी की पुतिन से मुलाकात के बाद कीव में जयशंकर का संदेश, बातचीत और कूटनीति को बताया युद्ध का विकल्प

नई दिल्ली, 4 सितंबर 2026। रूस और यूक्रेन के बीच करीब साढ़े चार साल से जारी युद्ध के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता को एक महत्वपूर्ण स्तर तक पहुंचाया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 3 सितंबर को यूक्रेन की राजधानी कीव में यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा से व्यापक वार्ता की और बाद में राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से भी मुलाकात की। दोनों बैठकों में युद्ध समाप्त करने के रास्तों, द्विपक्षीय संबंधों और काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई।

जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत की स्थिति दोहराते हुए कहा कि यह युद्ध का दौर नहीं है और समाधान युद्ध के मैदान से नहीं निकलेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघर्ष का प्रत्येक गुजरता दिन अधिक मौत और तबाही का कारण बन रहा है। यदि भारत किसी भी तरीके से शांति स्थापित करने में मदद कर सकता है तो वह इसके लिए तैयार है।

मोदी-पुतिन वार्ता के तुरंत बाद कीव पहुंचे जयशंकर

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका समय है। जयशंकर का कीव दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 31 अगस्त को बिश्केक में हुई मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद हुआ।

मोदी ने पुतिन से बातचीत के दौरान युद्ध को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि दुनिया को “अंतहीन युद्ध से युद्ध के अंत” की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। भारत ने यह भी दोहराया कि वह शांति के सभी प्रयासों का समर्थन करता है।

इसके बाद जयशंकर का कीव पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत एक ओर मॉस्को के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंध बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर यूक्रेन के साथ सीधे संवाद को भी आगे बढ़ा रहा है।

जेलेंस्की ने भारत की भूमिका का किया स्वागत

जयशंकर से मुलाकात के बाद यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के शांति प्रयासों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन भारत की उस प्रतिबद्धता की सराहना करता है जिसमें युद्ध समाप्त करने और शांति स्थापित करने की बात कही गई है। दोनों नेताओं की बातचीत में संघर्ष समाप्त करने के संभावित रास्तों पर चर्चा हुई।

यह मुलाकात इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत अब केवल मॉस्को के साथ संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यूक्रेनी नेतृत्व के साथ भी उच्चस्तरीय संपर्क बनाए हुए है।

काला सागर और भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा

जयशंकर और सिबिहा की बातचीत केवल युद्ध और शांति तक सीमित नहीं रही। काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा पर भी विशेष चर्चा हुई।

भारत के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युद्ध के कारण समुद्री परिवहन, खाद्य आपूर्ति, उर्वरक और ऊर्जा की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है। जयशंकर ने कहा कि ऐसे हमलों का असर केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों पर भी पड़ता है। ईंधन, उर्वरक और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति इससे प्रभावित हो सकती है।

भारत की मानवीय सहायता भी जारी

विदेश मंत्री ने बताया कि भारत यूक्रेन को अब तक 19 खेप मानवीय सहायता भेज चुका है। इनमें लगभग 160 टन सामग्री, जिसमें जनरेटर, दवाइयां और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं, भेजे गए हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि भारत की नीति केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि युद्ध से प्रभावित लोगों के लिए मानवीय सहायता भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या भारत रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थ बनेगा?

यह सवाल इस समय सबसे महत्वपूर्ण है।

तथ्य यह है कि भारत ने अभी औपचारिक रूप से किसी मध्यस्थता मिशन की घोषणा नहीं की है।

जयशंकर ने कहा है कि यदि भारत किसी भी प्रकार से मदद कर सकता है तो वह तैयार है। इसका अर्थ यह है कि नई दिल्ली ने शांति प्रक्रिया में योगदान की संभावना खुली रखी है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत को रूस और यूक्रेन के बीच आधिकारिक मध्यस्थ की भूमिका मिल गई है। उपलब्ध आधिकारिक बयानों में किसी औपचारिक मध्यस्थता तंत्र, विशेष दूत या भारत-प्रायोजित शांति समझौते की घोषणा नहीं हुई है।

भारत की कूटनीति का असली महत्व क्या है?

भारत की मौजूदा रणनीति को “दोनों पक्षों से संवाद और रणनीतिक स्वायत्तता” के रूप में समझा जा सकता है।

भारत रूस के साथ रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध रखता है। दूसरी तरफ यूक्रेन और यूरोपीय देशों के साथ भी उसके संबंध लगातार विकसित हो रहे हैं। ऐसे में नई दिल्ली ने युद्ध में किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय बातचीत और कूटनीति का रास्ता चुना है।

जयशंकर का कीव दौरा इसी संतुलित कूटनीति को आगे बढ़ाता दिखाई देता है।

विदेश मंत्रालय के अनुसार जयशंकर की 3 से 5 सितंबर की यूक्रेन और पोलैंड यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना तथा क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करना है।

वैश्विक स्तर पर भी शांति प्रयासों की हलचल तेज

जयशंकर की कीव यात्रा ऐसे समय हुई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए कूटनीतिक प्रयास दिखाई दे रहे हैं।

3 सितंबर को रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने भी कहा कि उन्हें रूस-यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए समझौते की संभावना दिखाई देती है। वहीं यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिकी वार्ताकारों के मॉस्को और कीव जाने की तैयारी है। इससे संकेत मिलता है कि युद्ध के बीच कूटनीतिक संपर्कों का एक नया दौर शुरू हो सकता है।

हालांकि दूसरी ओर युद्ध और ड्रोन हमले अभी भी जारी हैं। इसलिए कूटनीतिक गतिविधि बढ़ना और युद्ध समाप्त होने की वास्तविक स्थिति—दो अलग बातें हैं।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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