मुद्दा : आज का विषय – क्या मतदाता सूची मे नाम न होना नागरिकता का ख़त्म होना है?

नागरिकता का आधार मतदाता सूची नहीं, कानून है

नागरिकता के प्रश्न पर एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण और स्पष्ट संदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि केवल मतदाता सूची में नाम नहीं होने या नाम हट जाने भर से किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं हो जाती। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब नागरिकता और मतदाता सूची को लेकर देश में विभिन्न स्तरों पर बहस जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मामले में दिए गए अपने पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। यदि किसी व्यक्ति का नाम नागरिकता पर संदेह के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह मामला नागरिकता कानून के तहत निर्णय के लिए केंद्र सरकार को भेजे। जब तक सक्षम प्राधिकारी अंतिम निर्णय नहीं लेता, तब तक संबंधित व्यक्ति की नागरिकता का दर्जा यथावत रहेगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के प्रबंधन तक सीमित है। वह मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय ले सकता है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति की नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। नागरिकता का निर्धारण केवल संबंधित कानून और सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से ही किया जा सकता है। इस विषय में चुनाव आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है।
उधर, पश्चिम बंगाल से जुड़े SIR मामलों की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ के समक्ष कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाए गए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने बताया कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों में लगभग 34 लाख अपीलें लंबित हैं, जिसके कारण हजारों लोगों को वर्षों तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।


सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल सरकार ने मतदाता सूची से नाम हटाए गए लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अन्नपूर्णा योजना सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं देने संबंधी अधिसूचना जारी की है। साथ ही ऐसे लोगों को जाति प्रमाण पत्र जारी न किए जाने का भी मुद्दा अदालत के समक्ष रखा गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब तक किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सक्षम प्राधिकारी अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक उसे सरकारी योजनाओं और वैधानिक अधिकारों से वंचित करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण सिद्धांत भी है। यह स्पष्ट करती है कि मतदाता सूची और नागरिकता दो अलग-अलग विषय हैं। मतदाता सूची में नाम होना या न होना नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। नागरिकता का निर्णय केवल कानून के अनुसार सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादाओं का पूरी तरह पालन किया जाए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि किसी भी नागरिक के अधिकारों पर अंतिम निर्णय कानून और न्याय के आधार पर हो, न कि केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के आधार पर।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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