BRICS शिखर सम्मेलन: वैश्विक दक्षिण की बढ़ती ताकत या मतभेदों से घिरा मंच?
सकारात्मक उपलब्धियों और चुनौतियों का तुलनात्मक विश्लेषण | मानस दर्पण विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली, 14 सितंबर 2026। भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने समूह की बढ़ती वैश्विक भूमिका को रेखांकित किया है। सम्मेलन में विस्तारित BRICS के देशों ने 45 पन्नों के नई दिल्ली घोषणापत्र को स्वीकार किया। इसमें वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और वैश्विक शांति जैसे मुद्दों पर सहयोग की बात कही गई।
लेकिन सम्मेलन की सफलता को केवल घोषणाओं के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। BRICS के सामने सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हित, चीन-भारत जैसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मतभेद और घोषणाओं को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने की चुनौती भी मौजूद है।
क्या रहा सकारात्मक?
1. भारत की कूटनीतिक भूमिका मजबूत हुई
भारत ने अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले देशों को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत कराने में सफलता हासिल की। विशेष रूप से ईरान और UAE जैसे देशों के बीच तनाव के बावजूद संयुक्त घोषणा संभव होना भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
2. ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती
BRICS ने संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक प्रभावी भागीदारी और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता दोहराई। इससे वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने का प्रयास दिखाई देता है।
3. डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में प्रयास
BRICS ने साझा मुद्रा की घोषणा करने के बजाय फिलहाल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया है। इससे भविष्य में सदस्य देशों के बीच व्यापार में वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था विकसित हो सकती है।
4. AI और तकनीक पर सहयोग
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर सहयोग और Global South की जरूरतों के अनुरूप AI व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया। चीन ने BRICS AI Open Source Zone जैसी पहल का प्रस्ताव भी रखा है।
5. स्वास्थ्य और कृषि पर व्यावहारिक पहल
भारत की अध्यक्षता में कृषि, डिजिटल कृषि, मानसिक स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा और स्वस्थ जीवनशैली जैसे क्षेत्रों में सहयोग की कई पहल सामने आई हैं।
क्या हैं नकारात्मक पक्ष और चुनौतियां?
1. सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद
BRICS में भारत-चीन सहित कई देशों के रणनीतिक हित हमेशा एक जैसे नहीं हैं। ऐसे में हर महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दे पर साझा नीति बनाना कठिन रहेगा।
2. घोषणाओं को जमीन पर उतारना बड़ी चुनौती
BRICS की बैठकों में अनेक महत्वाकांक्षी घोषणाएं होती रही हैं। वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि कितनी घोषणाएं ठोस परियोजनाओं, निवेश और व्यापार में बदलती हैं। विशेषज्ञों ने भी BRICS के सामने इसी चुनौती को प्रमुख माना है।
3. आर्थिक हितों में असमानता
BRICS के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं, राजनीतिक व्यवस्थाएं और विकास के स्तर अलग-अलग हैं। इसलिए समान आर्थिक नीति बनाना आसान नहीं है।
4. पश्चिम के साथ संबंधों का सवाल
BRICS को कई बार पश्चिमी प्रभाव के प्रतिरोधी मंच के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसके अधिकांश सदस्य अमेरिका और यूरोप के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध भी रखते हैं। इसलिए पूर्ण आर्थिक अलगाव व्यावहारिक विकल्प नहीं दिखता।
5. विस्तार से निर्णय प्रक्रिया जटिल हो सकती है
BRICS के विस्तार से इसका वैश्विक प्रभाव बढ़ा है, लेकिन अधिक देशों के शामिल होने से सभी मुद्दों पर सहमति बनाना और समूह को एक दिशा में आगे ले जाना भी कठिन हो सकता है।
सकारात्मक बनाम नकारात्मक — एक नजर में
| सकारात्मक पक्ष | चुनौती/नकारात्मक पक्ष |
|---|---|
| ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत | सदस्य देशों के अलग-अलग हित |
| भारत की कूटनीतिक भूमिका मजबूत | भारत-चीन जैसे मतभेद |
| स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा | साझा वित्तीय व्यवस्था की राह कठिन |
| AI, स्वास्थ्य व कृषि सहयोग | घोषणाओं के क्रियान्वयन की चुनौती |
| वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग | पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक निर्भरता |
| शांति और संवाद पर जोर | भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव |
BRICS सम्मेलन को न तो पूरी तरह पश्चिम-विरोधी गठबंधन और न ही केवल आर्थिक संगठन के रूप में देखना उचित होगा। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका बढ़ता आर्थिक और जनसांख्यिकीय आधार तथा Global South के लिए वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराना है। वहीं इसकी सबसे बड़ी कमजोरी सदस्य देशों के बीच मौजूद रणनीतिक मतभेद हैं।
इसलिए BRICS की वास्तविक सफलता घोषणापत्र की लंबाई से नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश, भुगतान व्यवस्था, स्वास्थ्य, तकनीक और वैश्विक शासन सुधार के क्षेत्र में दिखाई देने वाले ठोस परिणामों से तय होगी।
— मानस दर्पण विशेष रिपोर्ट






