दो साल तक चला आरटीआई का संघर्ष, केंद्रीय सूचना आयोग ने देरी पर नहीं दिया जवाब! पोस्टल ऑर्डर की सूचना के मामले में सिर्फ हिदायत देकर अपील निस्तारित
हेमंत सिंह गोनिया ने 17 अक्टूबर 2024 को मांगा था डाक विभाग की बिक्री और कमीशन का हिसाब; 16 मई 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग पहुँची द्वितीय अपील, 6 अक्टूबर 2026 को आया फैसला—सवाल, इतने लंबे इंतजार का कारण क्या था?

हल्द्वानी/नई दिल्ली। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया का मामला लगभग दो वर्ष तक चला। भारतीय डाक विभाग के नैनीताल मंडल से पोस्टल ऑर्डर की बिक्री, मूल्य, कमीशन और सरकारी खाते में जमा धनराशि का विवरण मांगने से शुरू हुआ यह मामला प्रथम अपील से होते हुए केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुँचा। आयोग ने 6 अक्टूबर 2026 को द्वितीय अपील का निस्तारण कर दिया, लेकिन उसके आदेश में एक महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित रह गया—जब अपील मई 2025 से आयोग के समक्ष लंबित थी, तो उसका अंतिम निस्तारण अक्टूबर 2026 में क्यों हुआ और इस अवधि में लगे समय का कारण क्या था?
17 अक्टूबर 2024 को मांगी थी वित्तीय जानकारी
केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के अनुसार, हेमंत सिंह गोनिया ने 17 अक्टूबर 2024 को केंद्रीय जन सूचना अधिकारी, कार्यालय वरिष्ठ अधीक्षक डाकघर, नैनीताल मंडल से सूचना मांगी थी। आवेदन में वर्ष 2010 से संबंधित अवधि तक विभिन्न मूल्यवर्ग के पोस्टल ऑर्डर की बिक्री की संख्या, कुल बिक्री मूल्य, निर्धारित दरों और संबंधित शासनादेशों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। साथ ही बिक्री से प्राप्त आय, कमीशन और सरकारी खाते में जमा धनराशि का विवरण भी मांगा गया था।
यह केवल सामान्य जानकारी का मामला नहीं था, बल्कि सरकारी विभाग के वित्तीय रिकॉर्ड और बिक्री से प्राप्त धनराशि के लेखा-जोखा से संबंधित था।
विभाग ने 21 नवंबर 2024 को दिया जवाब
आयोग के आदेश में दर्ज विभागीय जवाब के अनुसार, 29 जून 2018 से संबंधित आंकड़ों में 43,408 पोस्टल ऑर्डर की बिक्री, ₹10,50,490 का कुल मूल्य और ₹1,05,969 कमीशन दर्ज किया गया। विभाग ने कुछ जानकारी के लिए भारतीय डाक विभाग की आधिकारिक वेबसाइट का लिंक भी बताया।
हालांकि, मूल आवेदन में वर्ष 2010 से आगे की जानकारी मांगी गई थी। आयोग के आदेश में उद्धृत आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि मांगी गई पूरी अवधि का वर्षवार विवरण उपलब्ध कराया गया था या नहीं। यही वह बिंदु था जिस पर सूचना की पूर्णता को लेकर सवाल उठे।
प्रथम अपील के बाद भी मामला नहीं सुलझा
विभाग के जवाब से असंतुष्ट होकर गोनिया ने 16 दिसंबर 2024 को प्रथम अपील दायर की। 3 जनवरी 2025 को प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने जन सूचना अधिकारी के जवाब को कायम रखा और कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण देते हुए वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी का हवाला दिया।
इसके बाद 16 मई 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की गई। आयोग के अभिलेख में इस मामले की संख्या CIC/POSTS/A/2025/116734 दर्ज है।
आयोग में अपील लंबित रहने की अवधि पर सवाल
आयोग के आदेश में सुनवाई की तारीख 5 अक्टूबर 2026 और निर्णय की तारीख 6 अक्टूबर 2026 दर्ज है। इस हिसाब से द्वितीय अपील दायर होने और अंतिम आदेश आने के बीच लगभग 508 दिन बीते। मूल आरटीआई आवेदन से अंतिम आदेश तक करीब 719 दिन का समय लगा।
यहाँ सवाल केवल इतना नहीं है कि सूचना विभाग ने कितने दिन में जवाब दिया, बल्कि यह भी है कि प्रथम अपील का निर्णय आने के बाद केंद्रीय सूचना आयोग में पहुँचे मामले के अंतिम निस्तारण में लगभग 17 महीने क्यों लगे। क्या मामले में कोई अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए थे? क्या सुनवाई की तारीख निर्धारित करने में समय लगा? क्या आयोग के समक्ष लंबित मामलों का दबाव कारण था? या कोई अन्य प्रशासनिक कारण था?
आयोग के उपलब्ध आदेश में इन सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया है। आदेश में यह भी दर्ज नहीं है कि द्वितीय अपील के निस्तारण में लगे समय के कारणों की अलग से समीक्षा की गई हो।
आयोग ने जन सूचना अधिकारी को दी हिदायत
सूचना आयुक्त आनंदी रामलिंगम के आदेश में कहा गया कि विभाग ने 21 नवंबर 2024 के जवाब और 3 जनवरी 2025 के प्रथम अपीलीय आदेश के माध्यम से सूचना संबंधी प्रश्नों का उत्तर दिया था। आयोग ने मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं मानी और अपील का निस्तारण कर दिया।
हालांकि, आयोग ने बिंदु संख्या 3 के संबंध में यह भी पाया कि जन सूचना अधिकारी अपीलकर्ता को यह बताने में विफल रहे कि संबंधित सूचना आधिकारिक वेबसाइट पर पहले से उपलब्ध थी। इस पर जन सूचना अधिकारी को भविष्य में आरटीआई के जवाब देते समय उचित सावधानी बरतने तथा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचना की जानकारी स्पष्ट रूप से देने की हिदायत दी गई।
आयोग ने न तो जुर्माना लगाने का आदेश दिया और न ही वर्ष 2010 से मांगी गई पूरी अवधि की अतिरिक्त सूचना उपलब्ध कराने का स्पष्ट निर्देश दिया।
आरटीआई कानून क्या कहता है?
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7(1) के अनुसार, सामान्य मामलों में जन सूचना अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर सूचना देनी होती है या कानून के अनुरूप निर्णय करना होता है। धारा 19(6) प्रथम अपील के निस्तारण के लिए सामान्यतः 30 दिन और लिखित कारण दर्ज करके अधिकतम 45 दिन की अवधि निर्धारित करती है।
द्वितीय अपील का अधिकार धारा 19(3) के अंतर्गत है। हालांकि, इस धारा में केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा प्रत्येक द्वितीय अपील के निस्तारण के लिए कोई सामान्य निश्चित 30-दिन की समय-सीमा निर्धारित नहीं है। इसलिए केवल 508 दिन की अवधि के आधार पर कानून का उल्लंघन घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन इतनी लंबी प्रतीक्षा के कारणों पर पारदर्शिता का सवाल अवश्य उठता है।
केंद्रीय सूचना आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आयोग द्वितीय अपील में सूचना उपलब्ध कराने का आदेश देने सहित कानून में निर्धारित शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले में पूरी अवधि की सूचना उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर अलग से विचार क्यों नहीं किया गया।
सबसे बड़ा सवाल—क्या सूचना के अधिकार का उद्देश्य सिर्फ अपील बंद करना है?
इस मामले में अंतिम आदेश से अपील की प्रक्रिया समाप्त हो गई, लेकिन आम नागरिक के दृष्टिकोण से एक व्यापक सवाल सामने आता है: जब कोई व्यक्ति सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी मांगता है और संतुष्ट नहीं होने पर निर्धारित अपील प्रक्रिया अपनाता है, तो अंतिम निर्णय में केवल विभाग के पुराने जवाब को पर्याप्त मान लेना क्या हर मामले में सूचना संबंधी विवाद का वास्तविक समाधान है?
इस मामले में केंद्रीय सूचना आयोग ने जन सूचना अधिकारी को एक बिंदु पर सावधानी बरतने की हिदायत दी, लेकिन अपील के अंतिम निस्तारण तक लगे समय का कारण आदेश में स्पष्ट नहीं किया। यही वह प्रश्न है जिस पर आयोग से पारदर्शी स्पष्टीकरण की अपेक्षा की जा सकती है।
आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया का यह मामला सूचना के अधिकार की समयबद्धता, अपीलों के निस्तारण में लगने वाले समय और नागरिकों को वास्तविक सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर विचार करने का अवसर देता है। सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी मांगने वाले नागरिक के लिए केवल अपील का निस्तारण ही नहीं, बल्कि मांगी गई सूचना की पूर्णता और विवाद के अंतिम समाधान का महत्व भी उतना ही है।







