फर्जी प्रमाणपत्रों से MBBS सीट हथियाने का खेल: NEET काउंसलिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल

मानस दर्पण विशेष रिपोर्ट

देश में मेडिकल शिक्षा में प्रवेश के लिए NEET-UG को पारदर्शी और मेरिट आधारित व्यवस्था माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में सामने आए कुछ मामलों ने आरक्षण और विशेष कोटे के नाम पर फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर MBBS सीट हासिल करने की कोशिशों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन मामलों ने यह चिंता भी पैदा की है कि यदि प्रमाणपत्रों का समय रहते और स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं किया गया तो वास्तविक रूप से पात्र अभ्यर्थी अपने अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में 64 प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए

NEET-UG 2025 की उत्तर प्रदेश काउंसलिंग में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से MBBS में प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान 64 प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए। ये प्रमाणपत्र विभिन्न जिलों से जारी होने का दावा करते थे। जांच में प्रमाणपत्रों के फर्जी पाए जाने के बाद संबंधित अभ्यर्थियों के प्रवेश निरस्त किए गए तथा उन्हें आगे की काउंसलिंग से प्रतिबंधित करने और FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए गए।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जांच में मेरठ, सहारनपुर, बलिया, भदोही, गाजीपुर, वाराणसी, गाजियाबाद, आगरा और बुलंदशहर सहित कई जिलों से जुड़े प्रमाणपत्र संदिग्ध या फर्जी पाए गए।

फर्जी प्रमाणपत्र का सीधा असर वास्तविक हकदार पर

मेडिकल कॉलेज की एक सीट सामान्य सीट की तरह केवल एक सीट नहीं होती। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित या विशेष श्रेणी की सीटें उन अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित होती हैं जो निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक मानकों को पूरा करते हैं।

यदि कोई अपात्र व्यक्ति फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर ऐसी सीट हासिल करता है तो उसका संभावित प्रभाव दो स्तरों पर पड़ता है—

  • पात्र अभ्यर्थी का अवसर प्रभावित होता है।
  • काउंसलिंग व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठता है।

इसीलिए प्रमाणपत्रों का सत्यापन केवल औपचारिक प्रक्रिया न होकर प्रवेश व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

EWS और PwD प्रमाणपत्रों का भी दुरुपयोग

जम्मू-कश्मीर के एक मामले में MBBS प्रवेश के लिए कथित रूप से फर्जी PwD और EWS प्रमाणपत्र इस्तेमाल किए जाने पर आर्थिक अपराध शाखा ने मामला दर्ज किया। जांच एजेंसी के अनुसार फर्जी दस्तावेजों के आधार पर MBBS में प्रवेश हासिल करने का आरोप सामने आया और मामले में IPC की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई।

एक अन्य न्यायिक मामले में अदालत के रिकॉर्ड में EWS श्रेणी की MBBS सीट हासिल करने के लिए कथित रूप से गलत/हेरफेर किए गए प्रमाणपत्र का उल्लेख हुआ। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल किसी एक राज्य या एक विशेष कोटे तक सीमित मानना उचित नहीं होगा।

NRI कोटे में भी फर्जी दस्तावेजों की जांच

मेडिकल प्रवेश में फर्जीवाड़े की एक अन्य गंभीर कड़ी NRI कोटे से जुड़ी जांचों में सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार ED की जांच में बड़ी संख्या में कथित फर्जी NRI प्रमाणपत्रों का मामला सामने आया, जिनके आधार पर MBBS और PG मेडिकल सीटों पर प्रवेश दिलाने की कोशिशों की जांच की गई। इसके बाद NRI प्रमाणपत्रों के सत्यापन की व्यवस्था को और कड़ा किया गया।

NEET-UG 2026 में भी दस्तावेजों को लेकर NTA की सख्ती

राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के NEET-UG 2026 सूचना बुलेटिन में स्पष्ट किया गया है कि आरक्षण का लाभ संबंधित वैध केंद्रीय/राज्य सूची और निर्धारित पात्रता के आधार पर ही दिया जाएगा। PwBD श्रेणी के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल या सरकारी अस्पताल से संबंधित प्रमाणपत्र/मूल्यांकन की व्यवस्था का उल्लेख है।

NTA की वेबसाइट पर NEET-UG 2026 के लिए Fake, Altered, or AI-Generated Documents के संबंध में भी अलग सार्वजनिक सूचना उपलब्ध है।

कहां है व्यवस्था की कमजोरी?

इन मामलों से कुछ महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं—

पहला, प्रमाणपत्र जारी करने वाली सरकारी संस्था के रिकॉर्ड से प्रवेश से पहले अनिवार्य ऑनलाइन सत्यापन क्यों न हो?

दूसरा, क्या केवल दस्तावेज अपलोड कर देने को पात्रता का पर्याप्त आधार माना जाना चाहिए?

तीसरा, क्या मेडिकल कॉलेजों को प्रवेश के बाद भी प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन करना चाहिए?

चौथा, यदि किसी प्रमाणपत्र को बाद में फर्जी पाया जाता है तो केवल प्रवेश रद्द करना पर्याप्त है या फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उसका इस्तेमाल करने वाले सभी संबंधित लोगों की आपराधिक जांच भी होनी चाहिए?

पांचवां, यदि किसी सीट पर अपात्र व्यक्ति प्रवेश ले चुका है तो उस सीट से वंचित हुए पात्र अभ्यर्थी के हितों की भरपाई कैसे होगी?

दो स्तर की जांच जरूरी

हाल ही में झारखंड में मेडिकल प्रवेश में फर्जी प्रमाणपत्रों के मामलों के बाद व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रमाणपत्रों की ऑनलाइन जांच संबंधित जारी करने वाली प्राधिकरण से तथा संस्थान स्तर पर भौतिक सत्यापन की व्यवस्था पर जोर दिया गया।

इसी तरह की दोहरी व्यवस्था देशभर में लागू करना एक प्रभावी कदम हो सकता है।

सरकार और जांच एजेंसियों के सामने चुनौती

फर्जी प्रमाणपत्र का मामला सामने आने पर केवल अभ्यर्थी पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। जांच में यह भी पता लगाया जाना आवश्यक है कि—

  1. प्रमाणपत्र वास्तव में किसने तैयार किया?
  2. संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में उसकी एंट्री कैसे हुई?
  3. प्रमाणपत्र का सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
  4. काउंसलिंग के दौरान दस्तावेज किस अधिकारी/संस्था ने स्वीकार किए?
  5. क्या किसी बिचौलिए या एजेंट की भूमिका थी?
  6. क्या मेडिकल कॉलेज या काउंसलिंग व्यवस्था में किसी स्तर पर मिलीभगत हुई?
  7. क्या इसी तरीके से अन्य अभ्यर्थियों को भी प्रवेश दिलाया गया?

यदि संगठित तरीके से फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए हों तो जांच का दायरा केवल एक अभ्यर्थी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

मेरिट और आरक्षण दोनों की रक्षा जरूरी

यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि आरक्षण व्यवस्था स्वयं समस्या नहीं है। आरक्षण संविधान और कानून के तहत निर्धारित सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की व्यवस्था है। समस्या तब पैदा होती है जब कोई अपात्र व्यक्ति फर्जी प्रमाणपत्र के माध्यम से उस व्यवस्था का लाभ हासिल करता है।

इसलिए समाधान आरक्षण समाप्त करना नहीं, बल्कि आरक्षण के वास्तविक लाभार्थी की पहचान और प्रमाणपत्रों का मजबूत सत्यापन होना चाहिए।

NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और उसके बाद होने वाली MBBS काउंसलिंग में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। फर्जी प्रमाणपत्र के जरिए एक सीट हासिल करना केवल नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि इससे उस अभ्यर्थी का अवसर भी प्रभावित होता है जिसने निर्धारित पात्रता और मेरिट के आधार पर प्रवेश पाने की उम्मीद की थी।

हालिया मामलों से यह संकेत जरूर मिलता है कि मेडिकल प्रवेश में प्रमाणपत्र सत्यापन की व्यवस्था को और अधिक तकनीकी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।

साथ ही, प्रत्येक मामले में अंतिम दोष सिद्ध होने तक संबंधित व्यक्ति को केवल “आरोपी” या “कथित रूप से फर्जी प्रमाणपत्र इस्तेमाल करने वाला” ही कहा जाना चाहिए। जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष के आधार पर ही अंतिम दोष तय होना चाहिए।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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