पटवाडांगर की जमीन पर सरकार के दावों पर यशपाल आर्य ने उठाए सवाल, बोले- न पैमाइश हुई, न मालिक का पता, फिर भी होटल को सौंप दी जमीन

‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान के तहत कांग्रेस ने प्रदेश के 11 स्थानों पर सरकारी संपत्तियों को रक्षा सूत्र बांधकर बचाने का लिया संकल्प, 1.23 लाख नहीं, 1,232 एकड़ जमीन निजी हाथों में देने का आरोप

पटवाडांगर (नैनीताल), 4 नवंबर। उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक धरोहरों को निजी हाथों में सौंपने का मुद्दा गरमा गया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने धामी सरकार पर सरकारी संपत्तियों को निजी कंपनियों के हवाले करने की तैयारी का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश की करीब एक लाख करोड़ रुपये की सरकारी जमीनों और धरोहर संपत्तियों को 60 से 90 साल की अवधि के लिए निजी हाथों में देने की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने विशेष रूप से नैनीताल के पटवाडांगर की 13.64 एकड़ जमीन को लेकर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि जिस जमीन की न तो विधिवत पैमाइश हुई थी और न ही राजस्व अभिलेखों में मालिकाना हक स्पष्ट था, उसी जमीन को सरकार ने कृषि विभाग की बताकर होटल परियोजना के लिए सौंप दिया।
बुधवार को कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य गुरदीप सप्पल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पटवाडांगर पहुंचे यशपाल आर्य ने जमीन को निजी हाथों में दिए जाने का विरोध किया। इस दौरान उन्होंने लोक निर्माण विभाग के ज्योलीकोट निरीक्षण भवन को भी निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। कांग्रेस ने इसी मुद्दे को लेकर प्रदेशव्यापी ‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान शुरू किया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने प्रदेश के 11 स्थानों पर सरकारी संपत्तियों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लिया।
चार सरकारी दस्तावेजों में चार मालिक और अलग-अलग रकबे
यशपाल आर्य ने पटवाडांगर की जमीन के स्वामित्व और रकबे को लेकर सरकारी दस्तावेजों में सामने आ रहे विरोधाभासों को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2023 की बैठक में इस जमीन को जैव प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर से संबंधित बताते हुए इसका रकबा करीब 60 एकड़ दर्ज किया गया था। जून 2024 में इसे कृषि एवं उद्यान विभाग की 80 एकड़ भूमि बताया गया। 15 जनवरी 2025 के शासनादेश में 103 एकड़ जमीन को कृषि विभाग के स्वामित्व वाली भूमि बताकर उसमें से 23 एकड़ प्रीमियम रिसॉर्ट के लिए यूआईआईडीबी को देने का निर्णय लिया गया।
इसके बाद अगस्त 2025 की बैठक में इसे जैव प्रौद्योगिकी परिषद स्थित भूमि बताया गया, जबकि सितंबर 2025 में जारी राजस्व विभाग की अधिसूचना में इसका रकबा 108 एकड़ दर्ज किया गया। विश्वविद्यालय के लिए भी अलग-अलग दस्तावेजों में कभी 30 एकड़, कभी 15 एकड़ और कभी 26.4 एकड़ भूमि का उल्लेख किया गया।
आर्य ने कहा कि सरकार के अपने दस्तावेजों में जमीन का मालिक और रकबा लगातार बदलता रहा। सवाल यह है कि जब जमीन की वास्तविक स्थिति ही स्पष्ट नहीं थी तो उसे निजी परियोजना के लिए सौंपने की इतनी जल्दी क्यों दिखाई गई?
राजस्व अभिलेखों में जमीन दर्ज नहीं, फिर कृषि विभाग की कैसे हो गई?
नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि 4 सितंबर 2025 को राजस्व विभाग ने पटवाडांगर गांव का सर्वेक्षण और अभिलेख तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके पांच दिन बाद 9 सितंबर को राजस्व परिषद ने जिलाधिकारी नैनीताल को पत्र लिखकर बताया कि करीब 108 एकड़ भूमि वन विभाग और राजस्व विभाग के अभिलेखों में दर्ज नहीं है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब जमीन का स्वामित्व ही स्पष्ट नहीं था तो नियोजन विभाग ने जनवरी 2025 के शासनादेश में इसे कृषि विभाग की भूमि कैसे बता दिया? जिस विभाग के नाम जमीन दर्ज नहीं थी, वह उसे किसी अन्य संस्था को कैसे सौंप सकता है? आर्य ने इसे सरकारी दस्तावेजों में गंभीर विसंगति बताते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की।
सीवर प्लांट के लिए जमीन नहीं, होटल परियोजना के लिए रास्ता साफ
यशपाल आर्य ने नैनीताल शहर की सीवर व्यवस्था से जुड़े मामले को भी उठाया। उन्होंने कहा कि नैनीताल में सीवर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए जिलाधिकारी ने पटवाडांगर की जमीन को उपयुक्त बताते हुए अन्य जगह जमीन उपलब्ध नहीं होने की बात कही थी। यह परियोजना एशियाई विकास बैंक की योजना में भी शामिल थी।
इसके बावजूद अगस्त 2025 में सीवर प्लांट को वन भूमि पर स्थापित करने के निर्देश दिए गए। आर्य का आरोप है कि इसकी वजह होटल परियोजना पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका बताई गई। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जरूरत की परियोजना के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई, जबकि होटल परियोजना के लिए जमीन देने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।
उन्होंने बताया कि पटवाडांगर की 13.64 एकड़ जमीन 90 साल की अवधि के लिए देने के वास्ते 37.80 करोड़ रुपये का रिजर्व प्राइस और पांच रुपये प्रति वर्गमीटर सालाना किराया निर्धारित किया गया है। उनके अनुसार इस जमीन का बाजार मूल्य करीब 82 करोड़ रुपये है।
1871 से वैक्सीन संस्थान की पहचान, 1878 का ज्योलीकोट निरीक्षण भवन भी सूची में
आर्य ने कहा कि पटवाडांगर का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है। यहां अंग्रेजों के समय से देश का प्रमुख वैक्सीन संस्थान रहा है। इसके बावजूद इस क्षेत्र की जमीन को निजी होटल परियोजना के लिए देने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने 1878 में बने ज्योलीकोट लोक निर्माण विभाग के निरीक्षण भवन को भी निजी हाथों में देने की सूची में शामिल किए जाने पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि यह मामला केवल पटवाडांगर तक सीमित नहीं है। विकासनगर के डाकपत्थर में बंदोबस्त की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दिसंबर 2025 में जमीन देने की कार्रवाई की गई। इसमें खसरा संख्या तक दर्ज नहीं की गई। कॉर्बेट से लगे पाटकोट में 22 महीने बाद भी बंदोबस्त पूरा नहीं हुआ, जबकि धनौल्टी-मगरा की जमीन सौंपने के बाद वहां वन विभाग के पट्टे आवंटित होने की जानकारी सामने आई।
आर्य के मुताबिक अगस्त 2025 की सरकारी बैठक में जमीनों के मूल्य पर आगामी बैठक में चर्चा करने और सरकारी जमीनों का लैंड बैंक तैयार करने की बात दर्ज थी। इसके बावजूद जमीनों को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
नैनीताल जिले की कई ऐतिहासिक संपत्तियां भी निजी हाथों में देने की तैयारी का आरोप
नेता प्रतिपक्ष ने नैनीताल जिले की अन्य बेशकीमती संपत्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि रामगढ़ की 15 एकड़ जमीन और वर्ष 1899 में बना निरीक्षण भवन, कैंची धाम मार्ग पर वर्ष 1878 का रातीघाट निरीक्षण भवन, वर्ष 1866 का रानीबाग निरीक्षण भवन, राज्य के पैसे से खरीदी गई एचएमटी रानीबाग की 53 एकड़ भूमि और कॉर्बेट की सीमा पर स्थित पाटकोट की 37 एकड़ भूमि भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की ऐतिहासिक और सार्वजनिक महत्व की संपत्तियों को एक-एक कर बड़े होटल समूहों के हवाले करने की तैयारी की जा रही है।
गरीबों को आवास देने के लिए जमीन नहीं, निजी कंपनियों को देने की तैयारी
यशपाल आर्य ने सरकार की भूमि नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर सरकार के पास भूमिहीन गरीब परिवारों को आवास देने के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अनेक परिवार भी आवासीय भूमि की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दूसरी ओर सरकारी जमीनों को निजी कंपनियों को देने की प्रक्रिया चलाई जा रही है।
उन्होंने कहा कि जल विद्युत परियोजनाओं, सड़कों और अन्य विकास कार्यों के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भी सरकार के पास पर्याप्त जमीन नहीं है। उनके अनुसार प्रदेश के ऊर्जा एवं नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव ने स्वीकार किया है कि अकेले किशाऊ बांध परियोजना के क्षतिपूरक वनीकरण के लिए करीब दो हजार एकड़ भूमि की आवश्यकता है।
आर्य ने आरोप लगाया कि ऐसी स्थिति में सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने की नीति गरीबों, दलितों और जनजातीय समुदायों के हितों पर प्रतिकूल असर डाल सकती है।
जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज का मामला भी उठाया
नेता प्रतिपक्ष ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की 142 एकड़ जमीन का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि इस संपत्ति को एक निजी कंपनी को करीब एक करोड़ रुपये सालाना किराये पर देने का मामला उन्होंने विधानसभा में उठाया था, लेकिन सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने सितंबर-अक्टूबर 2024 में केदारनाथ उपचुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में प्रेसवार्ता कर इस मामले को उठाया था। आर्य ने कहा कि वर्ष 2004 में कांग्रेस की तत्कालीन तिवारी सरकार ने बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीद की सीमा तय की थी और वर्ष 2018 में भू-कानून में किए गए बदलावों का कांग्रेस ने सदन से सड़क तक विरोध किया था।
सभी निविदाएं निरस्त कर जमीन विभागों को लौटाने की मांग
यशपाल आर्य ने धामी सरकार से मांग की कि सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने के लिए जारी सभी निविदाएं तत्काल निरस्त की जाएं। यूआईआईडीबी को दी गई जमीनें संबंधित विभागों को वापस की जाएं। सरकारी भूमि पर अंतिम अधिकार मुख्यमंत्री को देने संबंधी 22 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय को वापस लिया जाए।
इसके साथ ही उन्होंने जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज निरस्त करने और पूरे मामले की उच्च न्यायालय की निगरानी में सीबीआई जांच कराने की मांग की।
आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन, अस्मिता और सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा के लिए कांग्रेस संघर्ष जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जमीनों और धरोहरों से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता, विभागीय सहमति, उचित मूल्यांकन और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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