चर्चा चौराहे की
उत्तराखंड में सियासत का नया मौसम: कोई रो रहा है, कोई जान का खतरा बता रहा है!

मानस दर्पण | व्यंग्य विशेष | देबू दयाल और मंगतराम की चौराहे वाली गपशप
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों मौसम विभाग की जरूरत शायद कुछ कम ही पड़ रही है। बादल आसमान में हों या न हों, सियासत में आंसुओं की बूंदाबांदी और आरोपों की बिजली लगातार चमक रही है। कहीं मंत्री जी अपनी पीड़ा बयां कर रहे हैं, कहीं नेता जी अपनी जान को खतरा बता रहे हैं। जनता सोच रही है कि आखिर पहाड़ की राजनीति में ऐसा कौन-सा भूकंप आ गया कि कुर्सियों पर बैठे लोगों को भी अब चैन नहीं मिल रहा!
इसी मुद्दे पर हमारे दो पुराने चौराहेबाज—देबू दयाल और मंगतराम—चाय की दुकान पर आमने-सामने बैठे। चाय गर्म थी, लेकिन बहस उससे भी ज्यादा गर्म!
देबू दयाल: मंगत राम, पहाड़ में ये हो क्या रहा है?
देबू दयाल: ओ मंगतराम! सुबह अखबार खोलो तो कोई नेता अपनी जान को खतरा बता रहा है, कोई अपनी पीड़ा सुना रहा है। आखिर ये उत्तराखंड है या राजनीति का कोई धारावाहिक, जिसमें हर एपिसोड में नया संकट आ जाता है?
मंगतराम: अरे देबू! तू भी बड़ा भोला है। पहले लोग जनता के सामने विकास का हिसाब देते थे। अब लगता है राजनीति में नया हिसाब-किताब शुरू हो गया है—किसकी जान खतरे में, किसका सम्मान खतरे में, किसकी कुर्सी खतरे में और किसकी सियासी दुकान खतरे में!
देबू दयाल: लेकिन मंगत राम, अगर किसी को सचमुच जान का खतरा है तो उसकी शिकायत गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। सुरक्षा तो हर नागरिक का अधिकार है। मंत्री हो या आम आदमी!
मंगतराम: बिल्कुल सही कह रहा है। मगर भाई, जनता का सवाल भी तो सुनो। अगर बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग ही खुद को असुरक्षित बता रहे हैं, तो आम आदमी किसके दरवाजे पर जाकर अपनी सुरक्षा की गुहार लगाए? और अगर आरोप राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं, तो उनकी जांच और सच्चाई सामने आनी चाहिए।
देबू दयाल: बात तो तेरी ठीक है। लेकिन एक बात समझ नहीं आती। ये नेता जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिए चुने जाते हैं या फिर एक दिन जनता को अपने दुख-दर्द सुनाने के लिए?
मंगतराम: अरे देबू, लोकतंत्र में नेता भी इंसान हैं। उन्हें भी परेशानी हो सकती है। मगर जनता यह भी देखना चाहती है कि उनकी परेशानियों के बीच जनता की परेशानी कहां खड़ी है।
देबू दयाल: जनता की फाइल किस मेज पर पड़ी है?
देबू दयाल: चल, मान लिया कि नेताओं की अपनी समस्याएं हैं। लेकिन मंगतराम, हमारे पहाड़ों की समस्याओं का क्या हुआ? गांवों में रोजगार की चिंता, युवाओं के पलायन का दर्द, सड़कों की हालत, अस्पतालों में सुविधाओं की जरूरत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटती जनता—इन पर भी कभी उतनी ही जोरदार चर्चा होगी?
मंगतराम: क्यों नहीं होगी! मगर जनता का दुर्भाग्य देख—उसकी समस्या सालों पुरानी है, जबकि सियासी विवाद रोज नया हो जाता है। जनता सड़क मांगती है, उसे बयान मिल जाता है। रोजगार मांगती है, उसे आश्वासन मिल जाता है। अस्पताल में सुविधा मांगती है, उसे फाइल का रास्ता बता दिया जाता है।
और जब किसी बड़े नेता का निजी विवाद सामने आता है, तो कैमरे, माइक और बयान—सब अचानक सक्रिय हो जाते हैं!
देबू दयाल: तो क्या हम मान लें कि पहाड़ में विकास की गाड़ी धीरे चलती है और राजनीतिक विवादों की गाड़ी एक्सप्रेसवे पर?
मंगतराम: मानना क्या, भाई! यह तो जनता का अनुभव है। लेकिन किसी विवाद को केवल तमाशा मानकर खारिज करना भी ठीक नहीं। असली सवाल यह है कि आरोपों की जांच हो, सच सामने आए और जनता के काम भी न रुकें।
मंगतराम का सवाल: आंसुओं का हिसाब कौन रखेगा?
देबू दयाल: मंगत राम, एक बात बता। जब कोई मंत्री अपनी पीड़ा सार्वजनिक करता है, तो जनता को उससे सहानुभूति रखनी चाहिए या सवाल पूछने चाहिए?
मंगतराम: दोनों! सहानुभूति इंसानियत है और सवाल लोकतंत्र की ताकत। मगर सवाल सबके लिए एक जैसे होने चाहिए। आम आदमी खतरे की बात करे तो उसकी शिकायत भी उतनी ही गंभीरता से सुनी जाए। मंत्री खतरे की बात करे तो उसकी भी निष्पक्ष जांच हो।
और अगर किसी पर आरोप लगे हैं, तो केवल आरोप लगने से कोई दोषी नहीं हो जाता। प्रमाण, जांच और संबंधित पक्ष का जवाब—तीनों जरूरी हैं।
देबू दयाल: वाह मंगतराम! आज तो तू चाय की दुकान पर संविधान का पूरा पाठ पढ़ा रहा है।
मंगतराम: पढ़ना ही पड़ेगा देबू! वरना कहीं ऐसा न हो कि जनता समस्याएं लेकर पहुंचे और उसे जवाब मिले—पहले हमारी राजनीतिक परेशानी का समाधान करवा दो, फिर तुम्हारी सड़क और रोजगार की बात करेंगे!
दोनों ठहाका लगाते हैं। चायवाला भी मुस्कराता है, लेकिन तभी पास बैठा एक बुजुर्ग बोल पड़ता है—
बुजुर्ग: बेटा, मजाक अपनी जगह है। पर हमारी चिंता सुनने वाला भी कोई होना चाहिए। नेता जी की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन गांव के उस बुजुर्ग की सुरक्षा भी जरूरी है जो रात को अस्पताल जाने के लिए सड़क और गाड़ी ढूंढता है। नेता का सम्मान जरूरी है, लेकिन जनता के सम्मान का भी कोई हिसाब होना चाहिए।
बुजुर्ग की बात सुनकर दोनों कुछ देर चुप हो जाते हैं।
चौराहे का निष्कर्ष
देबू दयाल: मंगत राम, लगता है असली सवाल यह नहीं कि कौन रो रहा है और कौन खतरा बता रहा है। असली सवाल यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में जनता के आंसू पोंछने का एजेंडा कब सबसे ऊपर आएगा?
मंगतराम: बिल्कुल! नेताओं की सुरक्षा हो, उनके आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और उनके निजी विवादों का समाधान कानून के दायरे में हो। लेकिन साथ ही जनता को भी रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, सड़क और जवाबदेह शासन मिले।
क्योंकि भाई, लोकतंत्र में नेता की आवाज भी सुनी जानी चाहिए और जनता की पुकार भी अनसुनी नहीं होनी चाहिए।
देबू दयाल ने चाय का आखिरी घूंट लिया और उठते हुए बोला—
“चल मंगत राम, आज की चर्चा यहीं खत्म करते हैं। अगली बार फिर मिलेंगे इसी चौराहे पर। पता नहीं तब तक राजनीति में आंसुओं का मौसम रहेगा, आरोपों की आंधी चलेगी या जनता के कामों की बहार आएगी!”
मंगतराम ने मुस्कराकर कहा—
“देबू, मौसम कोई भी हो, जनता को बस इतना चाहिए कि सरकार का ध्यान चौराहे की बहस से निकलकर उसके घर-द्वार तक पहुंचे!”
दोनों चले गए। चाय की दुकान पर चर्चा चलती रही और उत्तराखंड की जनता अपने उसी पुराने सवाल के साथ खड़ी रही—साहब, सियासत अपनी जगह, हमारे पहाड़ का काम कब होगा?







