लोक संस्कृति की थाप से गूंजा उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, ढोल-दमाऊ कार्यशाला में दिखी लोक विरासत की समृद्ध झलक

हल्द्वानी, 20 सितंबर 2026। उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक वाद्य परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘अपनी धरोहर न्यास’ के तत्वावधान में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के सी.डी.एस. जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में ढोल-दमाऊ कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ढोल-दमाऊ, हुड़का सहित पारंपरिक लोकवाद्यों की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्ता को प्रस्तुतियों के माध्यम से सामने रखा गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक ढोल-दमाऊ की थाप, दीप प्रज्वलन और शगुन आखर के साथ हुआ। अतिथियों का स्वागत एवं परिचय कराते हुए उन्हें ढोल-दमाऊ की लघु प्रतिकृति स्मृति चिह्न के रूप में भेंट की गई।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी, यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रान्त प्रचारक श्री चन्द्रशेखर जी, डॉ. सोहन लाल, श्री मोहन लाल, श्रीमती सुनीता जोशी, श्रीमती शांति जीना सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

श्रीमती शांति जीना ने कुमाऊँनी भाषा में उद्घाटन संबोधन देते हुए ‘अपनी धरोहर’ संस्था के उद्देश्यों और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण स्वयं से शुरू होता है तथा अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझना और उन्हें आगे बढ़ाना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।

इसके बाद संस्था पर आधारित वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया, जिसमें संस्था की स्थापना, उद्देश्यों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में किए जा रहे कार्यों को दर्शाया गया।

ढोल-दमाऊ की थाप ने बांधा समां

डॉ. सोहन लाल एवं उनकी टीम ने गणेश वंदना से ढोल-दमाऊ की विशेष प्रस्तुति का शुभारंभ किया। कलाकारों ने विभिन्न तालों और प्रहारों के सांकेतिक महत्व को समझाते हुए बताया कि उत्तराखण्ड में ढोल-दमाऊ केवल वाद्य नहीं, बल्कि लोकजीवन, पर्व-त्योहार, अनुष्ठान और सामाजिक परंपराओं से गहराई से जुड़े सांस्कृतिक माध्यम हैं।

यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने कहा कि इस तरह के आयोजन सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने ऐसे कार्यक्रमों को नियमित रूप से आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि युवा पीढ़ी अपनी लोक विरासत से परिचित होने के साथ ही उससे जुड़ाव महसूस कर सके।

इसके बाद श्री मोहन लाल एवं उनकी टीम ने ढोल-दमाऊ की प्रस्तुति दी। खास बात यह रही कि उनके आठ वर्षीय पौत्र हितेश कुमार ने भी प्रस्तुति में सहभागिता की। कलाकारों ने कुमाऊँनी संस्कृति में ढोल-दमाऊ के विभिन्न प्रयोगों, शुभ अवसरों, पर्वों तथा जागर जैसी लोक एवं धार्मिक परंपराओं में इसके महत्व को समझाया।

हुड़के की थाप ने दिखाई लोक संगीत की विविधता

कार्यक्रम में सुन्दर दास एवं उनकी टीम ने पारंपरिक वाद्य हुड़का की प्रस्तुति दी। कलाकारों ने हुड़के के सांस्कृतिक महत्व और विभिन्न लोक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में इसके प्रयोग की जानकारी दी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रान्त प्रचारक श्री चन्द्रशेखर जी ने भारत और उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसी भी संस्कृति की निरंतरता उसके मूल्यों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से बनी रहती है। उन्होंने युवाओं को लोक संस्कृति और विरासत से जोड़ने पर जोर दिया।

विश्वविद्यालय की विकास यात्रा पर वृत्तचित्र

कार्यक्रम के दौरान उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय की विकास यात्रा पर आधारित वृत्तचित्र भी प्रदर्शित किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के विस्तार, क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों में हुए नवीन विस्तार एवं परिवर्धन, प्रवेश संख्या में वृद्धि तथा विश्वविद्यालय की प्रगति को प्रदर्शित किया गया।

कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी ने कलाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए सभी अतिथियों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के शुभ अवसरों एवं विभिन्न आयोजनों में उत्तराखण्ड की लोक संगीत परंपराओं को स्थान देने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों को जारी रखने की बात कही।

विभिन्न संस्थाओं को किया सम्मानित

कार्यक्रम के अंत में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान ‘बैणी सेना’, ‘साथी’ सहित विभिन्न संगठनों एवं सांस्कृतिक संस्थाओं को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, संस्कृति प्रेमी और लोक कला के प्रशंसक उपस्थित रहे। ढोल-दमाऊ और हुड़के की प्रस्तुतियों ने सभागार में उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी।

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन प्रो. राकेश चन्द्र रयाल ने किया। आयोजन व्यवस्था में न्यास के अध्यक्ष विजय भट्ट, श्री कृष्ण चन्द्र बेलवाल, सर्व व्यवस्था प्रमुख, तथा श्री गोपाल सिंह पटवाल, व्यवस्था प्रमुख सहित आयोजन टीम के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आयोजन ने उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण, उनके नई पीढ़ी तक हस्तांतरण तथा विश्वविद्यालय परिसर को सांस्कृतिक संवाद एवं लोक विरासत के संरक्षण के महत्वपूर्ण मंच के रूप में विकसित करने का संदेश दिया।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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