कुंजापुरी मेले में 35 लाख में दलेर मेहंदी का शो, पहाड़ के लोक कलाकारों को मंच कब?

कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के बयान के बाद उठे सवाल, लाइव गायन के बजाय लिप-सिंक का आरोप; लोक संस्कृति और सरकारी खर्च पर बहस तेज

देहरादून। उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने के दावों के बीच टिहरी जिले के नरेंद्रनगर में आयोजित सिद्धपीठ मां कुंजापुरी मेले में पंजाबी गायक दलेर मेहंदी के कार्यक्रम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के बयान के अनुसार, कार्यक्रम के लिए दलेर मेहंदी को 35 लाख रुपये दिए गए। वहीं, कार्यक्रम में लाइव गायन के बजाय लिप-सिंक किए जाने और प्रस्तुति के दौरान अव्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं।
मंत्री के बयान के बाद अब आयोजन पर हुए खर्च, कलाकार के चयन और स्थानीय लोक कलाकारों को दिए जाने वाले अवसरों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह भी है कि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए आयोजित होने वाले मेलों में राज्य के अपने कलाकारों को कितनी प्राथमिकता मिल रही है।
मंत्री के बयान से सामने आया 35 लाख रुपये का मामला
कुंजापुरी मेले में दलेर मेहंदी की प्रस्तुति के लिए 35 लाख रुपये दिए जाने की बात स्वयं कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के बयान के हवाले से सामने आई है। इस रकम को लेकर अब आयोजन के खर्च का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ सकती है।
यदि कार्यक्रम के लिए इतनी बड़ी धनराशि खर्च की गई, तो यह जानना जरूरी है कि भुगतान किन शर्तों पर हुआ, कलाकार के चयन की प्रक्रिया क्या रही और कार्यक्रम के लिए निर्धारित मानकों का पालन किया गया या नहीं। हालांकि, भुगतान से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज और अनुबंध का विवरण सामने आए बिना कुल खर्च अथवा अन्य मदों में हुए भुगतान के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
लाइव गायन या लिप-सिंक, प्रस्तुति पर भी सवाल
मंत्री सुबोध उनियाल के बयान के अनुसार, कार्यक्रम के दौरान कलाकार की प्रस्तुति को लेकर असंतोष की स्थिति बनी। आरोप है कि कलाकार मंच पर अपेक्षित तरीके से प्रस्तुति नहीं दे पा रहे थे और अपने ही गीतों पर लिप-सिंक कर रहे थे। इस घटनाक्रम के बाद मंच पर मंत्री की नाराजगी भी चर्चा का विषय बनी।
यदि कार्यक्रम में वास्तव में लाइव गायन के स्थान पर लिप-सिंक किया गया था, तो आयोजकों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कलाकार के साथ हुए अनुबंध में प्रस्तुति की क्या शर्तें निर्धारित थीं। क्या कार्यक्रम लाइव गायन के लिए तय किया गया था? क्या प्रस्तुति की गुणवत्ता जांचने की कोई व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब आयोजन की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
पहाड़ के लोक कलाकारों को मंच देने की जरूरत
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान जागर, ढोल-दमाऊं, हुड़का, थड्या-चौफला और विभिन्न लोकगीतों से जुड़ी है। जौनसार-बावर से लेकर गढ़वाल और कुमाऊं तक लोक कलाकार पीढ़ियों से इस विरासत को सहेजते आ रहे हैं। इसके बावजूद स्थानीय कलाकारों को बड़े मंच, नियमित कार्यक्रम और पर्याप्त पारिश्रमिक मिलने की समस्या लंबे समय से चर्चा में रही है।
ऐसे में कुंजापुरी जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक मेले में स्थानीय कलाकारों की भागीदारी और उन्हें दिए गए पारिश्रमिक का ब्योरा सामने आना चाहिए। यदि राज्य के लोक कलाकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं, तो यह सांस्कृतिक नीति के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जैसे लोक कलाकार भी पारंपरिक संगीत की मौलिकता और मंचीय प्रस्तुतियों की गुणवत्ता पर जोर देते रहे हैं। लोक कलाकारों का कहना है कि उत्तराखंड के मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में स्थानीय प्रतिभाओं को उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि पारंपरिक विधाएं केवल आयोजनों तक सीमित न रहें, बल्कि नई पीढ़ी तक भी पहुंचें।
बड़े नामों पर खर्च, स्थानीय कलाकारों के हिस्से में क्या?
बड़े और लोकप्रिय कलाकारों को आमंत्रित करना किसी भी आयोजन की दर्शक संख्या बढ़ाने का माध्यम हो सकता है। लेकिन जब सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, तो उसके औचित्य, पारदर्शिता और परिणामों का आकलन भी जरूरी हो जाता है।
कुंजापुरी मेले के मामले में यही सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि आयोजन के कुल बजट में उत्तराखंड के लोक कलाकारों के लिए कितना प्रावधान किया गया था। कितने स्थानीय कलाकारों को मंच मिला, उन्हें कितना पारिश्रमिक दिया गया और बाहरी कलाकारों के कार्यक्रम पर कितनी राशि खर्च हुई—इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
सांस्कृतिक आयोजनों का उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना या बड़े नामों को मंच पर लाना नहीं होना चाहिए। ऐसे आयोजन स्थानीय कला, भाषा, संगीत और परंपराओं को प्रोत्साहित करने का भी माध्यम बन सकते हैं।
कलाकार की बीमारी संबंधी बयान के बाद बढ़े सवाल
गायक मीका सिंह की ओर से दलेर मेहंदी की बीमारी और सर्जरी का जिक्र किए जाने की बात भी चर्चा में है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कलाकार कार्यक्रम प्रस्तुत करने में चिकित्सकीय रूप से सक्षम थे या नहीं। इस संबंध में कोई निष्कर्ष निकालने से पहले प्रमाणित जानकारी आवश्यक है।
फिर भी आयोजन से जुड़े व्यावहारिक सवाल अपनी जगह हैं। क्या प्रस्तुति से पहले कार्यक्रम की तकनीकी और व्यावसायिक शर्तों की पुष्टि की गई थी? क्या आयोजकों ने प्रस्तुति के स्वरूप और गुणवत्ता को लेकर स्पष्ट समझौता किया था? यदि निर्धारित शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो अनुबंध के अनुसार क्या कार्रवाई की जा सकती है?
धामी सरकार से पारदर्शिता की मांग
इस पूरे मामले में अब राज्य सरकार और संबंधित आयोजन समिति की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। 35 लाख रुपये के भुगतान का आधार, अनुबंध की शर्तें, चयन प्रक्रिया और कार्यक्रम की वास्तविक प्रस्तुति से संबंधित जानकारी सार्वजनिक होने पर ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि प्रदेश के लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए कौन-सी योजनाएं संचालित हैं और बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में उनके लिए क्या व्यवस्था की गई है। यदि किसी कार्यक्रम में अनुबंध का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जांच और नियमानुसार कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
संस्कृति का सम्मान तभी, जब अपने कलाकारों को मिले सम्मान
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान उसकी लोक परंपराओं और कलाकारों से है। जागर की गूंज, ढोल-दमाऊं की थाप और थड्या-चौफला की मधुरता ही इस पर्वतीय प्रदेश की विशिष्ट पहचान बनाती है। ऐसे में कुंजापुरी मेले में हुए खर्च को लेकर उठे सवाल केवल एक कलाकार के कार्यक्रम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बहस भी है कि सार्वजनिक धन से आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लाभ स्थानीय कलाकारों तक किस हद तक पहुंच रहा है।
अब निगाहें सरकार और आयोजन समिति के जवाब पर हैं। यदि 35 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, तो उसके पीछे का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने और यहां के कलाकारों को सम्मानजनक अवसर देने के लिए सरकार की ठोस योजना क्या है।
जनता के धन का हिसाब और लोक संस्कृति का सम्मान—दोनों जरूरी हैं।


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गिरीश भट्ट

मुख्य संवाददाता - मानस दर्पण

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