एथनॉल प्लांट को लेकर सुरपुर चकलुवा में ग्रामीणों की चिंता, बोले—विकास चाहिए, लेकिन जल-जंगल-जमीन और जनस्वास्थ्य की कीमत पर नहीं

कालाढूंगी/चकलुवा। सुरपुर चकलुवा क्षेत्र में प्रस्तावित/संबंधित एथनॉल प्लांट को लेकर ग्रामीणों के बीच पर्यावरण, कृषि भूमि, बगीचों, जलस्रोतों और जनस्वास्थ्य से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर चिंता सामने आई है। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास और रोजगार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन किसी भी औद्योगिक परियोजना के संचालन से पहले उसके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का वैज्ञानिक एवं पारदर्शी आकलन आवश्यक है।

ग्रामीणों ने कहा कि एथनॉल प्लांट जैसी औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की स्थिति में धूल, धुआँ, गैसीय उत्सर्जन और गंध जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इससे आसपास रहने वाले लोगों को आँखों में जलन, गले में परेशानी, खाँसी तथा सांस संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि इन प्रभावों की वास्तविक स्थिति प्लांट की तकनीक, उत्सर्जन नियंत्रण व्यवस्था और संचालन पर निर्भर करेगी, इसलिए ग्रामीणों ने नियमित और स्वतंत्र निगरानी की मांग उठाई है।

सबसे बड़ी चिंता पानी और भूजल को लेकर

ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र की कृषि और बागवानी काफी हद तक उपलब्ध जलस्रोतों और भूजल पर निर्भर है। ऐसे में औद्योगिक इकाई से निकलने वाले अपशिष्ट के उचित उपचार और निस्तारण को लेकर विशेष सावधानी जरूरी है।

ग्रामीणों की मांग है कि प्लांट से निकलने वाले औद्योगिक अपशिष्ट और अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था, उसके निस्तारण की प्रक्रिया तथा आसपास के भूजल एवं जलस्रोतों की गुणवत्ता की नियमित जांच सुनिश्चित की जाए। जांच रिपोर्ट ग्रामीणों के सामने सार्वजनिक की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की आशंका या भ्रम की स्थिति न बने।

खेती और बगीचों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल

सुरपुर चकलुवा क्षेत्र में किसानों की जमीन और बगीचे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि भविष्य में वायु, जल या मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है तो इसका असर कृषि उत्पादन और बागवानी पर पड़ सकता है।

इसी कारण ग्रामीण चाहते हैं कि परियोजना के प्रभाव का आकलन केवल प्लांट परिसर तक सीमित न रहे, बल्कि आसपास के खेतों, बगीचों, जलस्रोतों और आबादी वाले क्षेत्रों को भी निगरानी के दायरे में रखा जाए।

बदबू और शोर को लेकर भी चिंता

ग्रामीणों ने संभावित दुर्गंध और औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न शोर को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि प्लांट के संचालन से आसपास के गांवों में लगातार दुर्गंध या अत्यधिक शोर की समस्या पैदा होती है तो इसका सीधा असर ग्रामीणों के दैनिक जीवन पर पड़ेगा।

इसके साथ ही औद्योगिक इकाइयों में आग, रासायनिक पदार्थों के रिसाव अथवा अन्य आकस्मिक घटनाओं से निपटने के लिए आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की तैयारियों की भी जानकारी ग्रामीणों को दी जानी चाहिए।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभागों के समक्ष मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर पारदर्शिता की मांग रखी है—

  • परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों की वैज्ञानिक जांच।
  • प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों एवं उनकी कार्यक्षमता की नियमित निगरानी।
  • भूजल, सतही जल और आसपास के जलस्रोतों की नियमित गुणवत्ता जांच।
  • औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार और निस्तारण की पारदर्शी व्यवस्था।
  • हवा, पानी और मिट्टी की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
  • आसपास के खेतों और बगीचों पर संभावित प्रभाव की निगरानी।
  • दुर्गंध और शोर की शिकायतों के लिए प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था।
  • किसी औद्योगिक दुर्घटना की स्थिति में आपातकालीन सुरक्षा योजना।
  • ग्रामीणों को परियोजना से संबंधित महत्वपूर्ण पर्यावरणीय दस्तावेजों और निगरानी रिपोर्टों की जानकारी उपलब्ध कराना।

“विकास का विरोध नहीं, सुरक्षित विकास की मांग”

ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था का विरोध करना नहीं है। उनकी चिंता अपने गांव और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर है। ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रोजगार और विकास का स्वागत है, लेकिन विकास के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा और जनहित की गारंटी भी जरूरी है।

ग्रामीणों का कहना है कि जल, जमीन और पर्यावरण केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी जिम्मेदारी हैं। इसलिए किसी भी औद्योगिक परियोजना को लेकर निर्णय लेते समय स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

सुरपुर चकलुवा के ग्रामीणों ने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने का आह्वान करते हुए कहा कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, उपजाऊ जमीन, हरे-भरे बगीचों और बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए है।

ग्रामीण एकता जिंदाबाद।
जल-जंगल-जमीन की रक्षा जिंदाबाद।
जय हिंद, जय किसान।

नोट: यह रिपोर्ट ग्रामीणों द्वारा व्यक्त आशंकाओं और मांगों पर आधारित है। एथनॉल प्लांट से वास्तविक पर्यावरणीय प्रभावों के संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित पर्यावरणीय स्वीकृतियों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच, जल/वायु/मिट्टी की वैज्ञानिक रिपोर्ट तथा परियोजना की वास्तविक संचालन स्थिति के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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