खड़गे की सभा के बाद मैदान के ‘शुद्धिकरण’ पर भड़के यशपाल आर्य, बोले- यह गरीबों और दलितों का अपमान


हल्द्वानी। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी दौरे के बाद सभा स्थल के कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर सियासत गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने इस घटना को शर्मनाक, घृणित और निंदनीय बताते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की घटना भाजपा की संकीर्ण और भेदभावपूर्ण मानसिकता को दर्शाती है।
यशपाल आर्य ने कहा कि हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे के संबोधन के बाद उसी मंच का भाजपा के लोगों द्वारा ‘शुद्धिकरण’ किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह केवल किसी एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, बल्कि देश के गरीबों, दलितों, शोषितों, वंचितों और पीड़ित वर्गों के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य है।
सामाजिक समरसता की भूमि पर ऐसी घटना दुर्भाग्यपूर्ण
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोकतांत्रिक चेतना की भूमि के रूप में रही है। ऐसे में हल्द्वानी जैसे शहर में इस तरह की घटना का सामने आना प्रदेश की सामाजिक एकता के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने भाजपा नेताओं से समाज को जोड़ने और जाति तथा ऊंच-नीच की दीवारों को समाप्त करने की दिशा में काम करने की अपील की।
खरगे का सार्वजनिक जीवन सामाजिक न्याय को समर्पित
आर्य ने कहा कि मल्लिकार्जुन खरगे केवल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि देश के वरिष्ठ जननेताओं में शामिल हैं। उनका सार्वजनिक जीवन संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष को समर्पित रहा है। ऐसे नेता की जनसभा के बाद मैदान का ‘शुद्धिकरण’ करना सामाजिक बराबरी की भावना का अपमान है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक समानता की स्थापना के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर समेत देश के अनेक महापुरुषों ने जीवनभर संघर्ष किया। आज भी यदि किसी व्यक्ति की जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर सार्वजनिक रूप से इस तरह का व्यवहार किया जाता है तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
सार्वजनिक मैदान किसी एक दल या व्यक्ति की संपत्ति नहीं
यशपाल आर्य ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक स्थान की पवित्रता किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग या राजनीतिक विचारधारा से तय नहीं होती। लोकतंत्र में सार्वजनिक मैदान जनता के होते हैं और वहां अलग-अलग राजनीतिक दलों की सभाएं होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम के बाद स्थान को ‘शुद्ध’ करने की कोशिश छुआछूत और ऊंच-नीच जैसी पुरानी कुरीतियों को बढ़ावा देने वाली मानसिकता को प्रदर्शित करती है। ऐसी घटनाएं समाज में गलत संदेश देती हैं और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करती हैं।
भाजपा से पूछा- क्या इस मानसिकता का समर्थन करती है?
नेता प्रतिपक्ष ने भाजपा से सीधा सवाल किया कि यदि किसी सार्वजनिक मैदान में किसी दलित नेता की सभा के बाद उसे ‘शुद्ध’ करने की आवश्यकता महसूस की जाती है तो क्या भाजपा नेतृत्व इस मानसिकता का समर्थन करता है? यदि नहीं, तो भाजपा को इस मामले में अपना स्पष्ट पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक और वैचारिक विरोध लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से किया जाना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करके।
समानता और भाईचारे की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत
आर्य ने कहा कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की जाति नहीं, बल्कि उसके विचार, कर्म और संवैधानिक अधिकार महत्वपूर्ण हैं। देश और समाज को आगे ले जाने के लिए छुआछूत, भेदभाव और ऊंच-नीच की मानसिकता को पीछे छोड़ना होगा।
उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे में राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे समाज में भाईचारा, समानता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करें, न कि ऐसी सोच को बढ़ावा दें जिससे समाज में विभाजन पैदा हो।






