2027 की तैयारी में भाजपा का 100 दिन का होमवर्क, टिकट की कसौटी पर संगठन की परीक्षा
चोरगलिया की मंडलीय बैठक में मंडल अध्यक्षों को मिली जिम्मेदारी, जमीनी फीडबैक और संभावित दावेदारों के आकलन पर जोर


हल्द्वानी/चोरगलिया। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को समय रहते सक्रिय करना शुरू कर दिया है। चोरगलिया में हुई मंडलीय बैठक और मंडल अध्यक्षों को सौंपे गए 100 दिन के होमवर्क को इसी चुनावी रणनीति की शुरुआती कड़ी माना जा रहा है। पार्टी का फोकस बूथ और क्षेत्र स्तर तक संगठन की सक्रियता बढ़ाने के साथ-साथ संभावित विधानसभा प्रत्याशियों को लेकर जमीनी फीडबैक जुटाने पर दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक जानकारों की नजर में भाजपा के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि सही सीट पर सही चेहरे और प्रभावी रणनीति का चयन करने की भी है। ऐसे में अगले 100 दिन संगठन के लिए एक तरह की परीक्षा माने जा रहे हैं।
कागजी बैठकों से आगे जमीन पर उतरने की तैयारी
विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी तैयारी लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। भाजपा ने मंडल अध्यक्षों को जिम्मेदारी देकर यह संकेत दिया है कि संगठन अब केवल बैठकों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहता।
मंडल स्तर के पदाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन की सक्रियता, बूथ की स्थिति, कार्यकर्ताओं की भागीदारी और जनता के बीच पार्टी की पकड़ का आकलन करना होगा। इससे पार्टी को चुनाव से काफी पहले जमीनी स्थिति का अंदाजा लगाने में मदद मिल सकती है।
टिकट के दावेदारों पर भी नजर
इस पूरी कवायद का सबसे अहम हिस्सा संभावित टिकट दावेदारों को लेकर निचले स्तर से फीडबैक जुटाना माना जा रहा है। यदि कार्यकर्ताओं और संगठन के स्थानीय पदाधिकारियों की राय को प्रत्याशी चयन में वास्तविक महत्व दिया जाता है तो यह पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के लिए महत्वपूर्ण कदम होगा।
अक्सर चुनाव के दौरान टिकट वितरण को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच ऊपर से नाम तय होने की चर्चाएं रहती हैं। ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि जमीनी फीडबैक को महज औपचारिक प्रक्रिया न बनाया जाए।
संभावित प्रत्याशियों की कसौटी पर जनता के बीच पकड़, क्षेत्रीय समस्याओं की समझ, संगठन में स्वीकार्यता, कार्यकर्ताओं से तालमेल और चुनाव जीतने की क्षमता जैसे मानकों को महत्व देना होगा।
कम अंतर से हारी सीटों पर खास नजर
भाजपा की रणनीति में उन विधानसभा सीटों को भी अहम माना जा रहा है जहां पिछले चुनाव में पार्टी को कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। ऐसी सीटों पर संगठनात्मक कमियों को दूर कर और स्थानीय मुद्दों को समझकर चुनावी तस्वीर बदली जा सकती है।
हालांकि इसके लिए केवल चुनाव से कुछ महीने पहले सक्रिय होना पर्याप्त नहीं होगा। 100 दिन का होमवर्क तभी प्रभावी होगा जब उसके बाद भी उसकी नियमित समीक्षा होती रहे और जिम्मेदार पदाधिकारियों से लगातार रिपोर्ट ली जाए।
उम्र नहीं, जीत की क्षमता बने कसौटी
टिकट वितरण में उम्र को एकमात्र आधार न बनाने का संकेत भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीति में अनुभवी नेताओं की अपनी भूमिका है तो युवा चेहरों में नई ऊर्जा और नए मतदाताओं से जुड़ने की क्षमता होती है।
ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती होगी कि पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान के साथ नए चेहरों को अवसर देने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अंतिम कसौटी जनता का विश्वास, संगठन में स्वीकार्यता और चुनावी क्षमता होनी चाहिए।
सरकार के कामकाज का भी होगा जनता के बीच हिसाब
2027 के चुनाव में संगठन की तैयारी के साथ सरकार के कामकाज का भी जनता के बीच मूल्यांकन होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के काम और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रियता दोनों चुनावी माहौल को प्रभावित करेंगे।
सड़क, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रह सकते हैं। इसलिए संगठन का होमवर्क केवल संभावित प्रत्याशियों की सूची तैयार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। कार्यकर्ताओं को यह भी समझना होगा कि जनता सरकार और अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के काम को किस नजर से देख रही है।
100 दिन के होमवर्क से साफ होगी चुनावी तस्वीर
चोरगलिया की मंडलीय बैठक को केवल एक सामान्य संगठनात्मक बैठक मानना जल्दबाजी होगी। इसे 2027 की चुनावी तैयारियों की शुरुआती कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि मंडल अध्यक्षों को दिया गया 100 दिन का होमवर्क कितनी गंभीरता से जमीन पर उतरता है।
यदि फीडबैक निष्पक्ष तरीके से जुटाया गया, कार्यकर्ताओं की राय को महत्व मिला और टिकट चयन में जनता की स्वीकार्यता को प्राथमिकता दी गई तो भाजपा अपनी चुनावी तैयारी को मजबूत आधार दे सकती है।
लेकिन यदि 100 दिन का होमवर्क केवल बैठकों, कागजी रिपोर्ट और औपचारिक फीडबैक तक सीमित रहा तो संगठन की मजबूत मशीनरी होने के बावजूद चुनावी मैदान में अपेक्षित परिणाम हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
फिलहाल 2027 की चुनावी पटकथा के शुरुआती पन्ने लिखे जा चुके हैं। अब देखना यह होगा कि अगले 100 दिनों में भाजपा का संगठन अपनी जमीन कितनी मजबूत करता है और टिकट की कसौटी पर कौन-कौन से चेहरे खरे उतरते हैं।







