हिमनद झीलों के फटने से संभावित आपदाओं का खतरा, जोखिम न्यूनीकरण को लेकर नैनीताल में विशेषज्ञों ने किया मंथन

120 प्रतिभागियों ने कार्यशाला में लिया हिस्सा, हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत करने पर दिया जोर

नैनीताल, 02 नवम्बर 2026। हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न होने वाली संभावित आपदाओं के खतरे को देखते हुए डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासनिक अकादमी, नैनीताल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) विषय पर महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने हिमनद झीलों की निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों के वैज्ञानिक आकलन, पूर्व चेतावनी प्रणाली के विकास और आपदा प्रबंधन की प्रभावी रणनीतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। इसमें विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के कुल 120 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

अकादमी के महानिदेशक वी.पी. पाण्डे के दिशा-निर्देशों में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के अपर सचिव प्रकाश चन्द्रा तथा विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण), पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, पद्मश्री अनूप साह और अकादमी के संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार की उपस्थिति में हुआ।

कार्यशाला में संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा और नेपाल में आई हालिया बाढ़ जैसी घटनाएं हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर करती हैं। भविष्य में ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और ठोस कार्ययोजना तैयार करना बेहद जरूरी है।

मुख्य अतिथि प्रकाश चन्द्रा ने बताया कि शासन स्तर पर हिमनद झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम आकलन किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं। उन्होंने कहा कि संभावित आपदाओं के खतरे को समय रहते पहचानना और प्रभावी तैयारी करना आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल ने सिक्किम में हिमनद झील फटने से उत्पन्न आपदा के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं में समय पर चेतावनी, त्वरित प्रतिक्रिया और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय से जनहानि एवं संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक और पद्मश्री अनूप साह ने भी हिमालयी पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार रखे।

वैज्ञानिक निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली पर विशेष जोर

कार्यशाला के तकनीकी सत्र में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून, आईआईआरएस, सीबीआरआई रुड़की, जी.बी. पंत विश्वविद्यालय पंतनगर, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल तथा अन्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।

विशेषज्ञों ने हिमनद झीलों की पहचान एवं निरंतर निगरानी, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग, संभावित खतरों का वैज्ञानिक आकलन तथा आपदा के दौरान त्वरित कार्रवाई जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी तंत्र और प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यशाला का संचालन कार्यक्रम निदेशक डॉ. मंजू पाण्डे ने किया। इस अवसर पर अकादमी के अधिकारी, कर्मचारी, विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि और आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ मौजूद रहे।

कार्यशाला में हुए विचार-विमर्श को हिमालयी क्षेत्रों में भविष्य की आपदा प्रबंधन योजनाओं को अधिक वैज्ञानिक, समन्वित और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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