ज्योलिकोट में जलजनित बीमारी का संकट: बीमारी से मौतों तक और राहत से व्यवस्था सुधार तक की पूरी तस्वीर

मानस दर्पण विशेष रिपोर्ट | नैनीताल

ज्योलिकोट। नैनीताल जनपद के ज्योलिकोट और आसपास के गांवों में सामने आया जलजनित बीमारी का संकट अब केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गया है, बल्कि इसने सुरक्षित पेयजल, सीवरेज व्यवस्था, जल स्रोतों की निगरानी और प्रशासनिक तैयारी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अगस्त से शुरू हुई स्वास्थ्य संबंधी चिंता सितंबर में पीलिया, डायरिया, उल्टी-दस्त और अन्य जलजनित रोगों के मामलों के बढ़ने के साथ गंभीर स्थिति में पहुंची। इस दौरान दो लोगों की मौत की खबर सामने आई और बड़ी संख्या में लोगों को उपचार की आवश्यकता पड़ी।

हालांकि, स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और उत्तराखंड जल संस्थान ने इसके बाद निगरानी, जांच, उपचार, क्लोरीनेशन, पेयजल आपूर्ति और घर-घर सर्वे का अभियान तेज किया है।


कहां-कहां फैला बीमारी का असर?

ज्योलिकोट न्याय पंचायत और आसपास के क्षेत्र के कई गांव बीमारी की चपेट में आए। उपलब्ध रिपोर्टों में ज्योलिकोट, गांजा, वीरभट्टी, बेलवाखान, छीड़ा, सरियाताल, भल्यूटी, चोपड़ा, कृष्णापुर और गेठिया सहित आसपास के क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों का उल्लेख किया गया है।

प्रभावित लोगों में उल्टी-दस्त, बुखार, कमजोरी, डायरिया, टायफाइड और पीलिया जैसे लक्षण सामने आने की जानकारी विभिन्न रिपोर्टों में दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने जलजनित रोगों को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में घर-घर सर्वे और स्वास्थ्य शिविरों को तेज किया।


दो मौतों के बाद बढ़ी चिंता

बीमारी के बीच दो लोगों की मौत की खबर ने पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में एक किशोर और एक महिला की उपचार के दौरान मौत का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, किसी भी मृत्यु को सीधे किसी एक जल स्रोत से जोड़ते समय चिकित्सकीय एवं प्रशासनिक जांच के अंतिम निष्कर्ष को आधार बनाना आवश्यक है। इसलिए मानस दर्पण इस रिपोर्ट में मौतों के कारण के संबंध में अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष आने तक सावधानी बरतने की अपील करता है।


पेयजल में संदूषण को लेकर गंभीर सवाल

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पेयजल व्यवस्था से जुड़ा है। प्रशासनिक स्तर पर पेयजल स्रोतों, टंकियों और पाइपलाइनों की जांच तथा क्लोरीनेशन की कार्रवाई की गई।

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान भी पेयजल और सीवरेज व्यवस्था को लेकर गंभीर टिप्पणियां सामने आईं। अदालत के समक्ष अधिकारियों की ओर से पेयजल स्रोत के संदूषण और सीवरेज संबंधी समस्या का उल्लेख किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। अदालत ने स्थिति को गंभीर मानते हुए प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल सुरक्षित पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।


18 अगस्त से स्वास्थ्य विभाग की निगरानी

स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार 18 अगस्त 2026 से 10 सितंबर तक प्रभावित क्षेत्रों में 1,540 घरों का घर-घर सर्वेक्षण किया गया।

इसी अवधि में:

  • पीएचसी ज्योलिकोट की ओपीडी में 675 मरीजों को उपचार एवं परामर्श दिया गया।
  • स्वास्थ्य शिविरों की ओपीडी में 468 मरीजों को उपचार एवं परामर्श मिला।
  • 130 मरीजों को आईपीडी में उपचार उपलब्ध कराया गया।
  • 673 लोगों को ओआरएस वितरित किया गया।
  • 3,900 क्लोरीन टैबलेट वितरित की गईं।
  • आउटब्रेक प्रबंधन के लिए 53 स्वास्थ्यकर्मी/चिकित्सकीय कार्मिक लगाए गए, जिनमें 26 चिकित्सक, 13 पैरामेडिकल स्टाफ, 5 सपोर्ट स्टाफ, 7 आशा कार्यकर्ता और 2 एएनएम शामिल बताए गए हैं।
  • ज्योलिकोट स्वास्थ्य केंद्र को 24 घंटे संचालित रखने की व्यवस्था की गई।

घर-घर पहुंची स्वास्थ्य टीमें

बीमारी की रोकथाम के लिए आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य टीमों को घर-घर जाकर लोगों की स्वास्थ्य स्थिति जानने के निर्देश दिए गए।

बुखार, उल्टी, दस्त, कमजोरी या पीलिया जैसे लक्षण वाले लोगों की पहचान कर उन्हें स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में रेफर करने की व्यवस्था की गई।

6 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार ज्योलिकोट न्याय पंचायत के 12 गांवों में से आठ गांवों को प्रभावित बताया गया था। स्वास्थ्य विभाग ने ओआरएस, जिंक और क्लोरीन टैबलेट वितरण के साथ लोगों को पानी उबालकर पीने, हाथ धोने और स्वच्छता बनाए रखने की सलाह दी।


11 सितंबर: 163 लोगों की जांच, 65 ब्लड सैंपल

11 सितंबर को स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में जांच एवं उपचार अभियान और तेज किया।

उस दिन:

  • विभिन्न स्वास्थ्य शिविरों में 163 लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई।
  • पीएचसी ज्योलिकोट में 98 लोगों की जांच हुई।
  • जरूरत के अनुसार 13 मरीज भर्ती किए गए।
  • घर-घर सैंपलिंग के दौरान 65 ब्लड सैंपल लिए गए।
  • पेयजल गुणवत्ता जांच के लिए अतिरिक्त पानी के नमूने लिए गए।
  • सचल चिकित्सा वाहन से 43 लोगों की जांच कर दवाएं वितरित की गईं।

पानी और रक्त की जांच के माध्यम से बीमारी के कारणों की पहचान और मरीजों के उपचार को अधिक वैज्ञानिक आधार देने का प्रयास किया जा रहा है।


विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएं भी शुरू

ज्योलिकोट पीएचसी में विशेषज्ञ चिकित्सकों की ओपीडी सेवाएं भी उपलब्ध कराई गईं। स्वास्थ्य विभाग ने हल्द्वानी के निजी एवं विशेषज्ञ चिकित्सकों को भी मरीजों की जांच और उपचार के लिए जोड़ा।

गंभीर मरीजों को आवश्यकता के अनुसार बी.डी. पांडे जिला अस्पताल नैनीताल, बेस अस्पताल हल्द्वानी और डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी जैसे उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में रेफर करने की व्यवस्था की गई।

10 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार एसटीएच हल्द्वानी में ज्योलिकोट क्षेत्र से पीलिया के 11 मरीज भर्ती किए गए थे, जिनमें एक मरीज की स्थिति गंभीर बताई गई थी।


पानी की समस्या से निपटने में जल संस्थान की बड़ी कार्रवाई

स्वास्थ्य संकट के साथ-साथ पेयजल व्यवस्था को सुधारने के लिए उत्तराखंड जल संस्थान ने भी अभियान तेज किया।

11 सितंबर के आसपास की कार्रवाई में:

32 हजार लीटर शुद्ध पेयजल वितरित

चार टैंकरों और पिकअप वाहनों के माध्यम से करीब 32,000 लीटर शुद्ध पेयजल प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचाया गया।

इससे 136 परिवारों को पेयजल उपलब्ध कराया गया।

पानी की आपूर्ति ज्योलिकोट बाजार, छीड़ा, ज्योली, बेलवाखान मल्ला, पेट्रोल पंप और वीरभट्टी सहित प्रभावित क्षेत्रों में की गई।


22 पेयजल शिकायतों का निस्तारण

जल संस्थान के अनुसार पेयजल से संबंधित 22 शिकायतों का निस्तारण किया गया तथा विभिन्न स्थानों से पानी के नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए।


टंकियों और पाइपलाइनों की सफाई

प्रभावित क्षेत्र में जल संस्थान द्वारा:

  • मुख्य पानी की टंकियों में क्लोरीनेशन
  • टैंकों की सफाई
  • पाइपलाइनों की फ्लशिंग
  • क्षतिग्रस्त पाइपलाइन की मरम्मत
  • पेयजल स्रोतों की सफाई
  • नौलों की सफाई और क्लोरीनेशन

जैसे कार्य किए गए।

सिमलखेत में 30 केएल क्षमता वाले टैंक की सफाई और करीब 50 मीटर पाइपलाइन की मरम्मत एवं फ्लशिंग की गई। देवलढूंगा स्रोत से ज्योलिकोट की पाइपलाइन की सफाई भी की गई। चोपड़ा के नौले की सफाई एवं क्लोरीनेशन किया गया।


सीवरेज व्यवस्था भी जांच के घेरे में

इस पूरे संकट ने पेयजल और सीवरेज व्यवस्था के बीच संभावित क्रॉस-कनेक्शन के सवाल को भी सामने ला दिया है।

जल संस्थान द्वारा ज्योलिकोट क्षेत्र में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से संबंधित मुख्य सीवर लाइन के एक हिस्से को बाईपास करने का काम शुरू किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

यही वह बिंदु है जिस पर भविष्य में स्थायी समाधान के लिए सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है—पेयजल स्रोत और सीवरेज लाइन के बीच किसी भी प्रकार का संभावित संपर्क पूरी तरह समाप्त किया जाए।


हाईकोर्ट ने भी लिया गंभीर संज्ञान

ज्योलिकोट एवं आसपास के गांवों में जलजनित बीमारी के मामले पर उत्तराखंड हाईकोर्ट में भी सुनवाई हुई।

रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने स्थिति को गंभीर मानते हुए प्रशासन को तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए। अदालत ने प्रभावित लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने, पानी के नमूनों की जांच कराने और राहत एवं उपचार व्यवस्था की निगरानी पर जोर दिया।

अदालत ने पेयजल विभाग तथा संबंधित अधिकारियों से स्थिति की रिपोर्ट भी मांगी।


अब तक की स्थिति: संकट से नियंत्रण की ओर, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं

12 सितंबर तक उपलब्ध सूचनाओं से यह स्पष्ट है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी तथा उपचार व्यवस्था को काफी बढ़ाया है। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की जांच, नए मरीजों का भर्ती होना और लगातार पानी की गुणवत्ता पर निगरानी की जरूरत यह बताती है कि स्थिति को अभी पूरी तरह सामान्य घोषित करना जल्दबाजी होगी।

11 सितंबर की रिपोर्ट में 13 मरीजों के पीएचसी में भर्ती किए जाने की जानकारी सामने आई। साथ ही स्वास्थ्य विभाग और जल संस्थान दोनों की गतिविधियां जारी रहीं।


पड़ताल में सामने आए पांच बड़े सवाल

1. बीमारी की शुरुआत के समय क्या पर्याप्त निगरानी हुई?

क्षेत्र में बीमारी के शुरुआती लक्षण सामने आने के बाद संक्रमण के स्रोत की पहचान कितनी जल्दी हुई, यह महत्वपूर्ण सवाल है।

2. पेयजल और सीवरेज लाइन की नियमित जांच कौन करेगा?

केवल संकट के समय सफाई और क्लोरीनेशन पर्याप्त नहीं है। नियमित निरीक्षण और रिकॉर्ड आधारित निगरानी जरूरी है।

3. जल स्रोतों की सुरक्षा कितनी मजबूत है?

टंकी, पाइपलाइन, स्रोत और वितरण नेटवर्क की नियमित जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

4. प्रभावित परिवारों को लगातार सुरक्षित पानी कैसे मिलेगा?

टैंकर से पानी पहुंचाना तत्काल राहत है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान सुरक्षित और भरोसेमंद पाइपलाइन व्यवस्था है।

5. बीमारी के वास्तविक कारण की अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट कब आएगी?

पानी, रक्त और अन्य नमूनों की प्रयोगशाला जांच के परिणामों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि बीमारी के स्रोत और कारण को लेकर किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।

ज्योलिकोट और आसपास के क्षेत्रों के लोगों से अपील है कि जब तक प्रशासन की ओर से पानी को पूरी तरह सुरक्षित घोषित न किया जाए, तब तक उबला हुआ अथवा प्रमाणित सुरक्षित पेयजल ही इस्तेमाल करें।

उल्टी-दस्त, बुखार, अत्यधिक कमजोरी, पेट दर्द अथवा पीलिया जैसे लक्षण दिखाई देने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें।

विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों के मामले में लापरवाही न बरती जाए।


निष्कर्ष

ज्योलिकोट का यह संकट हमें यह याद दिलाता है कि सुरक्षित पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता है।

अगस्त से सितंबर तक सामने आए मामलों ने स्वास्थ्य विभाग को घर-घर सर्वे, सैंपलिंग और उपचार व्यवस्था बढ़ाने के लिए मजबूर किया। वहीं जल संस्थान को टैंकरों से पानी पहुंचाने, टंकियों एवं पाइपलाइनों की सफाई, क्लोरीनेशन और मरम्मत जैसे कदम उठाने पड़े।

अब आवश्यकता इस बात की है कि तत्काल राहत के साथ-साथ पेयजल स्रोतों की स्थायी सुरक्षा, सीवरेज व्यवस्था का वैज्ञानिक सुधार, नियमित जल परीक्षण और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

ज्योलिकोट के लोगों को राहत तभी मानी जाएगी, जब बीमारी के मामले पूरी तरह नियंत्रित हों, पेयजल सुरक्षित हो और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।

— मानस दर्पण न्यूज़ पोर्टल विशेष रिपोर्ट | नैनीताल


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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