विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के अन्तर्गत पौधारोपण एवं व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन।

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग, भौमिकी व पर्यावरण विज्ञान विद्याशाखा के तत्वाधान में आज दिनांक 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के अन्तर्गत पौधारोपण एवं व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ विश्वविद्यालय के कुलपति (आभाषी माध्यम) प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी जी की अध्यक्ष्यता में, मुख्य अतिथि प्रो0 बी0 एस0 कालाकोटी पूर्व वैज्ञानिक एनबीआरआई, विशिष्ट अतिथि प्रो0 एस0 एस0 भाकुनी पूर्व वैज्ञानिक ‘ई’ वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून, निदेशक सीका प्रो0 गिरिजा पाण्डे, निदेशक एकडमिक प्रो0 पी0 डी0 पन्त तथा विभागाध्यक्ष डॉ0 हरीश चन्द्र जोशी के द्वारा दीप प्रजल्वन कर किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में विश्वविद्यालय परिसर में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमे अतिथियों सहित विश्वविद्यालय परिवार के शिक्षकों, कार्मिको, शोधार्थियों एवं शिक्षार्थियों ने प्रतिभाग किया। पौधारोपण कार्यक्रम के पश्चात द्वितीय सत्र में विज्ञान भवन में व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमे लगभग 68 प्रतिभागियों द्वारा प्रतिभाग किया गया।
वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. एच. सी. जोशी ने कार्यक्रम के उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि मानव समाज एवं परितंत्र के अन्य जीव जन्तुओ के लिए जल, वायु, मृदा आदि गुणवत्ता के साथ साथ इनकी उपलब्धता सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं और इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि पर्यावरण की दृष्टि से यह सीधे तौर पारिस्तिथिक तंत्र को प्रभावित करते है। भौमिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विद्यालय के निदेशक प्रो. पी. डी. पंत ने कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों, संकाय सदस्यों, शोधार्थियों और शिक्षार्थियों सहित सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गिरिजा पांडे, निदेशक (सीका) ने कहा कि सामाजिक चिंतन और मानवीय व्यवहार पर्यावरण को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैश्विक संघर्षों और युद्धों के बढ़ते प्रभावों का जिक्र करते हुए उन्होंने दुनिया भर में सामाजिक और रासायनिक विषाक्तता के बढ़ते स्तरों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने सतत भविष्य के निर्माण के लिए पर्यावरण क्षरण के मूल कारणों की पहचान और समाधान की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ0 एस0 एस0 भाकुनी ने अपने व्याख्यान में यह बताया की नियोटेक्टोनिक युग में पृथ्वी पर कई परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं जिसके सर्वाधिक प्रभाव नवीन हिमालयी क्षेत्र में सक्रिय रूप तौर पर भूकम्प व भ्रंशन की आवृत्ति स्वरूप में देखे जा रहे हैं, जो अनेक प्रकार की आपदाओं एवं भूगर्भिक दृष्टि से हिमालयी क्षेत्र में नई पर्यावरणीय चुनौतियॉ को जन्म दे रही हैं।
मुख्य वक्ता प्रो0 बी0 एस0 कालाकोटी ने अपने व्याख्यान के दौरान आवाहन किया कि पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए हमें आज दृढ़ संकल्प लेने की आवश्यकता हैं, क्योंकि मानव ने अपनी आवश्कता की पूर्ति हेतु प्रकृति के पारिस्थितिकी सन्तुलन को बिगाड़ दिया हैं जो वैश्विक चुनौति बनकर मानव ही नहीं वरन सम्पूर्ण जीव-जगत के लिए अभिशाप बन गया हैं। पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र 1960 के दशक उपरान्त मानव पहुच से वंचित नही रहे, हिमालयी क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों की अधिकता से सम्पूर्ण हिमालय जल संसाधन सर्वाधिक प्रभावित हैं जिससे पूरा एशिया का जल तंत्र प्रभावित हो रहा हैं, वैश्विक तापमान में वृद्वि होने से एक ओर हिमालयी ग्लेशियर तीव्र गति से पिघल रही हैं वही दूसरी ओर हिमालय की स्थानीय वनस्पतियों में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं जैसे कि ब्रहमकमल, सैमल, बुरांश , ऐकोनाइट्स, मेहल, काफल व पदम के वृक्षों में समय से पूर्व फूलों का खिलना, फल लगाना तथा नई किस्म की घास प्रजातियों का जन्म होना, हिमालयी जीव जन्तुओं हेतु चारे की कमी होना, आहार श्रृंखला प्रभावित होना, हिमालयी मानवीय अधिवासित गावों का पूर्ण रूप से पलायन करना तथा कई पादप व जन्तुओं का विलुप्त हो जाना प्रमुख रूप से देखा गया हैं।

कार्यक्रम के अध्यक्षीय उदबोधन में कुलपति प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी जी ने कहा है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाये जा रहे वैश्विक अभियानों को जमीनी स्तर पर उतारने, वृक्षारोपण तक सीमित न रहते हुये वृक्ष संरक्षण पर अधिक बल दिया जाय, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ पर्यावरण संतुलन में अधिक प्रभावी होगा तथा व्याख्यान में सभी वैज्ञानिकों ने यह संदेश दिया हैं कि वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास करने की आवश्कता हैं जिसमें स्थानीय हितधारको को साथ लेकर उनके कई पीढ़ीयों से संरक्षित परम्परागत ज्ञान का उपयोग किया जाय जिससे हम इस वैश्विक संकट का कुछ स्तर तक समाधान खोज सकते है।
कार्यक्रम संचालन डॉ0 कृष्ण कुमार टम्टा द्वारा किया गया, इसके अलावा डॉ0 बीना फुलारा, डॉ0 प्रीति पन्त, डॉ0 नेहा तिवारी, डॉ0 दीप्ति नेगी, डॉ0 खष्टी डसीला, डॉ0 कमल देवलाल, डॉ0 गगन सिंह, डॉ0 आशुतोष भट्ट, डॉ0 मंजरी अग्रवाल, डॉ0 अरबिन्द भट्ट, डॉ0 गोपाल व अन्य प्राध्यापकगण तथा वानकी व पर्यावरण विज्ञान के विद्यार्थी इसमें शामिल रहे ।








