हरेला पर्व पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश: अधिवक्ता ललित मोहन सिंह जीना की कुमाऊंनी कविता ने किया वृक्षारोपण का आह्वान

हल्द्वानी। उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के अवसर पर अधिवक्ता एवं साहित्यकार ललित मोहन सिंह जीना ‘ललितदीप’ ने अपनी नवीन स्वरचित कुमाऊंनी कविता ‘लगाओ खूब डौव, तभै ह्वल दुनी ल्हौण हरयाव्’ के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण का सशक्त संदेश दिया है।
कवि ने अपनी रचना के जरिए हरेला पर्व की मूल भावना को रेखांकित करते हुए कहा है कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपरा में वृक्षों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवनदाता और परिवार के सदस्य के समान सम्मान दिया जाता रहा है। उन्होंने आमजन से अपील की है कि यदि उनके आसपास कहीं भी खाली भूमि उपलब्ध हो तो वहां अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
कवि का कहना है कि हरेला पर्व का वास्तविक उद्देश्य केवल पर्व मनाना नहीं, बल्कि पृथ्वी पर हरियाली बढ़ाने का संकल्प लेना है। आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के दौर में इस लोकपर्व की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। वृक्ष वर्षा को आकर्षित करने, भूजल संरक्षण, स्वच्छ वातावरण बनाए रखने तथा मानव जीवन को स्वस्थ और सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अपनी कुमाऊंनी कविता में उन्होंने वृक्षों के रोपण, उनकी नियमित देखभाल, जल संरक्षण, हरियाली, खेती-किसानी, पशुधन और समृद्ध ग्रामीण जीवन के बीच गहरे संबंध को सहज एवं प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया है। कविता का मूल संदेश है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार पौधे लगाए और उनकी देखरेख करे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हरा-भरा और खुशहाल संसार तैयार किया जा सकता है।
कवि ने समाज से आपसी सहयोग और सामूहिक प्रयासों के साथ वृक्षारोपण अभियान को जन-आंदोलन बनाने का भी आह्वान किया है। उनका मानना है कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भाव ही हरेला पर्व की सबसे बड़ी सीख है।
रचनाकार:
एडवोकेट ललित मोहन सिंह जीना ‘ललितदीप’
हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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