सुबोध उनियाल होना आसान नहीं है: एक वीडियो से नहीं, पूरे जीवन से होती है किसी नेता की पहचान

देहरादून। आजकल राजनीति में एक नया चलन तेजी से देखने को मिल रहा है। किसी लोकप्रिय जनप्रतिनिधि को घेरना, कैमरा ऑन करना, तीखे सवालों से उकसाना और फिर उसकी प्रतिक्रिया को पूरे घटनाक्रम का केंद्र बनाकर प्रस्तुत कर देना। इससे कुछ समय के लिए सुर्खियां जरूर मिल जाती हैं, लेकिन अक्सर पूरी सच्चाई पीछे छूट जाती है।
हाल के दिनों में उत्तराखंड के वरिष्ठ मंत्री सुबोध उनियाल से जुड़ा एक वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो के आधार पर विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी एक क्षण की प्रतिक्रिया को पूरे व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन का पैमाना न बना दिया जाए।
यदि किसी मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि से कोई गलती हुई है तो उसके लिए देश में कानून, आचार संहिता, चुनाव आयोग और न्यायिक व्यवस्था मौजूद है। निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति को जानबूझकर उकसाकर उसकी प्रतिक्रिया को राजनीतिक हथियार बना देना लोकतांत्रिक विरोध से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन प्रतीत होता है।
जनता के बीच रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं सुबोध उनियाल
उत्तराखंड की राजनीति में सुबोध उनियाल उन नेताओं में शुमार किए जाते हैं जिन तक आम व्यक्ति की पहुंच आज भी अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है। सचिवालय हो, विधानसभा परिसर हो, मंत्री कार्यालय हो या उनका निजी आवास—लोग अपनी समस्याएं लेकर सीधे उनसे मिलने पहुंचते रहे हैं।
उत्तरकाशी, टिहरी, चकराता, विकासनगर और हरिद्वार समेत प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जो दावा करेंगे कि अपने काम के लिए उन्हें कभी उनके दरवाजे से निराश होकर नहीं लौटना पड़ा।
जिम्मेदारियों का दबाव और मानवीय स्वभाव
यह भी सच है कि कई बार उनका स्वभाव तल्ख दिखाई देता है। लेकिन इसके पीछे वर्षों का सार्वजनिक जीवन, हजारों लोगों की समस्याएं, विभागीय जिम्मेदारियां और निरंतर राजनीतिक दबाव भी एक वास्तविकता है। लगातार जनता के बीच रहना और हर दिन सैकड़ों अपेक्षाओं का सामना करना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता।
अत्यधिक कार्यभार और मानसिक तनाव कई बार व्यवहार में कठोरता ला सकता है। इसे उचित या अनुचित ठहराने का विषय अलग हो सकता है, लेकिन यह मानवीय स्वभाव का हिस्सा अवश्य है।
2008 की एक घटना जो बहुत कुछ कहती है
साल 2008 की बात है। उस समय सुबोध उनियाल गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए थे और देहरादून के सीएमआई अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे। कुछ दिनों बाद उन्हें कमरे में शिफ्ट किया गया। उस दौरान उनके साथ रहने वालों के अनुसार एक दिन उन्हें सीटी स्कैन के लिए नीचे ले जाया जा रहा था।
बताया जाता है कि रास्ते में उनकी नजर एक स्ट्रेचर पर ले जाए जा रहे मरीज पर पड़ी। उन्होंने तत्काल स्ट्रेचर रुकवाया और मरीज के साथ चल रही महिला से गढ़वाली भाषा में बातचीत की। जानकारी मिलने पर उन्होंने तत्काल अस्पताल प्रबंधन से संपर्क किया और मरीज के बेहतर उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा। इतना ही नहीं, इलाज का खर्च स्वयं वहन करने की भी बात कही।
यह घटना इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि उस समय वह स्वयं गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। इसके बावजूद एक परिचित क्षेत्रवासी की चिंता उनके मन में प्राथमिकता बनी रही। ऐसे प्रसंग किसी व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन के उस पक्ष को सामने लाते हैं जो अक्सर कैमरों की नजर से दूर रहता है।
विरोधियों ने भी नहीं लगाए व्यक्तिगत ईमानदारी पर गंभीर आरोप
सुबोध उनियाल का राजनीतिक जीवन तीन दशक से अधिक लंबा रहा है। विभिन्न दलों और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच सक्रिय रहने के बावजूद उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर गंभीर आरोप शायद ही कभी प्रमुखता से सामने आए हों।
राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन उनकी पहचान लंबे समय तक एक सक्रिय और काम करने वाले जनप्रतिनिधि की रही है। यही कारण है कि राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद उनकी लोकप्रियता का आधार बना हुआ है।
विरोध और उकसावे में अंतर समझना होगा
लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है। सत्ता से जवाब मांगना भी जरूरी है। लेकिन विरोध और उकसावे के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। किसी की लोकप्रियता को आधार बनाकर स्वयं को चर्चा में लाने की राजनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, किंतु इससे लोकतांत्रिक विमर्श मजबूत नहीं होता।
आलोचना होनी चाहिए, जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन निष्पक्षता और संतुलन भी उतना ही जरूरी है। किसी एक वीडियो, एक क्लिप या एक क्षण को पूरी कहानी बना देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
आखिर एक सवाल भी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल भी चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि संबंधित महिला उस मतदान केंद्र की मतदाता नहीं थीं, तो वह मतदान केंद्र के भीतर किस आधार पर पहुंचीं? सामान्य नियमों के अनुसार मतदान केंद्र के भीतर प्रवेश के अधिकार और प्रतिबंध स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।
यदि इस संबंध में कोई नियमों का उल्लंघन हुआ है तो इसकी जांच चुनाव अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके। लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल जनप्रतिनिधियों से ही नहीं, बल्कि सभी पक्षों से अपेक्षित होती है।
निष्कर्ष
किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पूरे जीवन, कार्यशैली और जनसेवा के इतिहास के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल कुछ सेकंड के वीडियो के आधार पर। मंत्री बन जाना शायद आसान हो, लेकिन वर्षों तक जनता की उम्मीदों का भार उठाना, लगातार लोगों के बीच रहना और राजनीतिक जीवन की चुनौतियों का सामना करना आसान नहीं होता।
शायद यही कारण है कि हर कोई सुबोध उनियाल नहीं बन सकता।


Advertisements

गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

You cannot copy content of this page