आरटीआई का बड़ा धमाका: उद्यान विभाग के 13 जिलों में हड़कंप, 3 जिलों ने ही मांगे ₹2.96 लाख

हल्द्वानी। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर उत्तराखण्ड के उद्यान विभाग में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हल्द्वानी निवासी समाजसेवी एवं आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनिया द्वारा पिछले 10 वर्षों के बजट, व्यय, योजनाओं, क्रय, ऑडिट और संभावित अनियमितताओं से जुड़ी विस्तृत सूचना मांगी गई थी। यह आवेदन निदेशक बागवानी मिशन के माध्यम से राज्य के सभी 13 जिलों के उद्यान अधिकारियों को प्रेषित किया गया, लेकिन अब तक केवल तीन जिलों के जवाब सामने आए हैं—और उन्होंने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तीन जिलों के जवाब ने खोली पोल
पिथौरागढ़, कोटद्वार (गढ़वाल) और उत्तरकाशी जिलों के लोक सूचना अधिकारियों ने मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय भारी-भरकम शुल्क की मांग कर दी। पिथौरागढ़ से 4941 पृष्ठों के लिए ₹9882, कोटद्वार से 13096 पृष्ठों के लिए ₹26192 और उत्तरकाशी से चौंकाने वाले 1,28,713 पृष्ठों के नाम पर ₹2,60,792 तक की राशि मांगी गई है। इन तीनों मामलों में कुल मांग ₹2.96 लाख के करीब पहुंच गई है।
सूचना देने से बचने का आरोप
आवेदक का आरोप है कि विभागों ने न तो प्रश्न-उत्तर के प्रारूप में सूचना दी और न ही मूल दस्तावेज संलग्न किए। इसके बजाय अत्यधिक पृष्ठों का हवाला देकर भारी शुल्क थोपने की कोशिश की गई, जिससे सूचना प्राप्त करना आम नागरिक के लिए कठिन हो जाए।
बाकी 10 जिलों पर भी उठे सवाल
अब तक 13 में से केवल 3 जिलों के जवाब आए हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यदि शेष 10 जिलों से भी इसी प्रकार शुल्क मांगा गया तो कुल राशि लाखों से भी अधिक हो सकती है। इससे पूरे प्रदेश में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
आरटीआई कानून की भावना पर प्रहार?
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7(1) के अनुसार 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है, जबकि धारा 7(9) में स्पष्ट किया गया है कि सूचना ऐसे रूप में दी जाए जिससे आवेदक को अनावश्यक कठिनाई न हो। इसके अलावा धारा 4(1)(b) के तहत कई जानकारियां पहले से सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराई जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि हजारों-लाखों पृष्ठों का हवाला देकर शुल्क मांगना कानून की मंशा के विपरीत है।
डिजिटल माध्यम की अनदेखी पर भी सवाल
वर्तमान डिजिटल युग में भी विभागों द्वारा ईमेल या सीडी जैसे माध्यम से सूचना देने का विकल्प नहीं दिया गया। जबकि अधिकांश सरकारी रिकॉर्ड कंप्यूटर में उपलब्ध होते हैं और उन्हें संक्षेप में उपलब्ध कराया जा सकता है।
प्रथम अपील दायर, निशुल्क सूचना की मांग
मामले को लेकर प्रथम अपील दायर कर दी गई है, जिसमें सभी जिलों की संयुक्त सुनवाई की मांग की गई है। अपील में स्पष्ट कहा गया है कि मांगी गई सूचना निशुल्क उपलब्ध कराई जाए और अत्यधिक शुल्क को निरस्त किया जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।
जुर्माने का प्रावधान भी मौजूद
आरटीआई अधिनियम की धारा 20 के तहत सूचना देने में लापरवाही या देरी पर प्रतिदिन ₹250 (अधिकतम ₹25,000) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। अपीलकर्ता ने चेतावनी दी है कि यदि समय पर सूचना नहीं दी गई तो मामला राज्य सूचना आयोग से लेकर उच्च न्यायालय तक ले जाया जाएगा।
मुहिम से मचा हड़कंप
हेमंत सिंह गौनिया लंबे समय से विभिन्न राज्यों—उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान—में आरटीआई के माध्यम से सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की मुहिम चला रहे हैं। उनके प्रयासों से कई विभागों में हलचल मची है और अधिकारियों को जवाबदेह होना पड़ रहा है।
जनसेवा में सक्रिय भूमिका
बताया जाता है कि समाजसेवी द्वारा संचालित जनसेवा केंद्र के माध्यम से आम लोगों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है, जिससे बड़ी संख्या में लोग लाभान्वित हो रहे हैं।
अब सबकी नजर कार्रवाई पर
यह मामला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शेष जिलों से पारदर्शी तरीके से सूचना उपलब्ध कराई जाएगी या यह विवाद आगे और तूल पकड़ेगा।


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गिरीश भट्ट

मुख्य संवाददाता - मानस दर्पण

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