रेशम की राखियों से आत्मनिर्भरता की नई डोर बुन रहीं महिलाएं

रक्षाबंधन पर्व को विशेष बनाने के लिए ‘रेशम नई पहल’ स्वयं सहायता समूह की महिलाएं पारंपरिक कला और रचनात्मकता का सुंदर संगम प्रस्तुत कर रही हैं। समूह से जुड़ी कविता ऐरी, किरण जोशी, स्मृति आर्या और अन्नू राणा अपने हाथों से आकर्षक रेशम की राखियां तैयार कर रही हैं।

 

इन हस्तनिर्मित राखियों में केवल रंग और सुंदरता ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भर बनने का संकल्प भी झलकता है। प्रत्येक राखी को बड़े धैर्य और बारीकी से तैयार किया जाता है, जिससे यह भाई-बहन के स्नेह के साथ स्थानीय हस्तशिल्प को भी सम्मान देती है।

समूह की महिलाओं का उद्देश्य लोगों को ‘वोकल फॉर लोकल’ से जोड़ना और स्थानीय उत्पादों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। उनका कहना है कि यदि लोग स्थानीय स्तर पर बनी हस्तनिर्मित राखियां खरीदेंगे, तो इससे महिलाओं को रोजगार मिलेगा, उनकी आजीविका मजबूत होगी और उत्तराखंड की पारंपरिक कला को भी नई पहचान मिलेगी।

इस रक्षाबंधन सभी से अपील है कि मशीन से बनी राखियों के बजाय स्थानीय महिलाओं द्वारा तैयार की गई रेशम की हस्तनिर्मित राखियों को अपनाएं और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की इस पहल को अपना सहयोग दें।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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