हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि अपराधी ज़िंदा हैं

पेपर लीक, छात्र आंदोलनों पर दमन और लोकतंत्र की परीक्षा—राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की गुहार
नई दिल्ली।देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक प्रकरणों, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा इनके विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर की जा रही कार्रवाई को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस के प्रवक्ता दीपक बल्यूटिया ने भारत की माननीया राष्ट्रपति को एक भावुक एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित प्रार्थना-पत्र भेजा है।
पत्र में कहा गया है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। ऐसे में जब देशभर के छात्र जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार हो रहे पेपर लीक और कथित अनियमितताओं के विरुद्ध लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ उठा रहे हैं, तब उनकी बात सुनने के बजाय उन पर बल प्रयोग, हिरासत और दमनात्मक कार्रवाई की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं।
प्रार्थना-पत्र में कहा गया है कि वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले लाखों युवाओं और उनके परिवारों का भरोसा परीक्षा प्रणाली पर लगातार कमजोर हुआ है। यदि मेहनत और योग्यता के स्थान पर पेपर लीक जैसी घटनाएं सुर्खियां बनें और शांतिपूर्ण विरोध करने वालों को भय और दमन का सामना करना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
पत्र में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि बढ़ती निराशा और असुरक्षा की भावना अनेक युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। लेखक ने उल्लेख किया है कि छात्र समुदाय में गहरा आक्रोश और हताशा व्याप्त है तथा कुछ दुखद घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। ऐसे हालात में व्यवस्था के प्रति विश्वास बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
पत्र का सबसे मार्मिक हिस्सा वह है, जिसमें लिखा गया है—
“हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि अपराधी ज़िंदा हैं।”
इस पंक्ति के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया है कि जब पेपर लीक जैसे मामलों के दोषियों पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, जबकि ईमानदारी से संघर्ष कर रहे युवाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तब न्याय व्यवस्था और शासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
राष्ट्रपति को संबोधित पत्र में यह भी आग्रह किया गया है कि वे इस पूरे प्रकरण में संवैधानिक हस्तक्षेप करते हुए पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच सुनिश्चित कराएं, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा की जाए।
पत्र के अंत में कहा गया है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों की आवाज़ सुनने की संवेदनशीलता से मजबूत होता है। यदि देश का युवा स्वयं को असुरक्षित, उपेक्षित और निराश महसूस करेगा, तो यह केवल एक पीढ़ी का संकट नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का भी प्रश्न होगा।
भवदीय
दीपक बल्यूटिया
प्रवक्ता, उत्तराखंड कांग्रेस






