मेडिकल, बैलिस्टिक्स और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर न्यायिक अकादमी में मंथन

चेन ऑफ कस्टडी में एक भी गैप पूरे ट्रायल को प्रभावित कर सकता है: मुख्य न्यायाधीश

भवाली (नैनीताल), 26 सितंबर 2026। उत्तराखण्ड न्यायिक एवं विधिक अकादमी, भवाली में मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस, बैलिस्टिक्स एविडेंस, साइबर क्राइम तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता एवं मूल्यांकन विषय पर महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन, चिकित्सा, फोरेंसिक, बैलिस्टिक एवं साइबर विशेषज्ञों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि अपराध की विवेचना में छोटे-छोटे प्रक्रियात्मक पहलू पूरे ट्रायल की दिशा तय कर सकते हैं। उन्होंने अल्मोड़ा के ट्रिपल मर्डर केस का उल्लेख करते हुए Chain of Custody में गैप, FIR-GD एंट्री, पंचनामा, मौके पर साक्ष्य को सील न करना तथा लैपटॉप और सीडी जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की गलत हैंडलिंग को गंभीर विषय बताया।

उन्होंने कहा कि मौके से साक्ष्य के संकलन और सीलिंग से लेकर मालखाने में जमा करने, रजिस्टर एवं जीडी में प्रविष्टि तथा FSL भेजे जाने तक पूरी प्रक्रिया में कोई गैप नहीं होना चाहिए। विवेचक, चिकित्सक और फोरेंसिक विशेषज्ञों को भयमुक्त होकर वैज्ञानिक पद्धति से कार्य करना चाहिए।

पुलिस अकेले नहीं कर सकती विवेचना: न्यायमूर्ति मैथाणी

हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रविंद्र मैथाणी ने कहा कि आधुनिक अपराधों की विवेचना केवल पुलिस का कार्य नहीं रह गया है। मेडिकल, बैलिस्टिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्य का न्यायालय में admissible यानी स्वीकार्य होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

चेन ऑफ कस्टडी में हर स्तर पर रिकॉर्ड जरूरी

अपर निदेशक शादाब बानो ने कहा कि बाल, रक्त अथवा अन्य कोई भी साक्ष्य मौके पर ही सील किया जाना चाहिए। वहीं पंचनामा तैयार कर साक्ष्य को मालखाने में जमा किया जाए तथा मालखाना रजिस्टर और जीडी में आवश्यक प्रविष्टि के बाद नियमानुसार FSL भेजा जाए। उन्होंने कहा कि साक्ष्य को किसी कर्मचारी के पास व्यक्तिगत रूप से नहीं रखा जाना चाहिए।

उन्होंने गिरफ्तारी के समय Ground of Arrest बताए जाने तथा संवैधानिक सुरक्षा के प्रावधानों पर भी जानकारी दी। साथ ही कहा कि नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट जबरन नहीं कराए जा सकते। उन्होंने इसके संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के Selvi बनाम कर्नाटक निर्णय का उल्लेख किया।

कार्यक्रम का उद्देश्य विवेचना से जुड़े विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना, अपराध स्थल से FSL तक Chain of Custody को मजबूत करना तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों को विधिक एवं संवैधानिक दायरे में न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना रहा।

अकादमी के निदेशक प्रदीप पंत ने कहा कि आधुनिक अपराधों की बदलती प्रकृति को देखते हुए पुलिस, न्यायपालिका, अभियोजन, चिकित्सा और फोरेंसिक विशेषज्ञों के बीच बेहतर संवाद और समन्वय आवश्यक है। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक एवं निर्बाध न्यायिक प्रक्रिया के लिए समन्वित प्रयास करने का संकल्प लिया।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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