शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी की ऊंची दर, ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ पर मंडराया संकट

– स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी 40% तक पहुंची
– मजबूरी में कृषि और स्वरोज़गार की ओर लौट रहे युवा
– पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो रही नई पीढ़ी
देश में शिक्षित युवाओं के बीच बेरोज़गारी की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। एक ओर जहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर उनके लिए उपयुक्त रोजगार के अवसर नहीं बन पा रहे हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी दर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो चिंता का विषय है।
भारत की कुल आबादी में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 36.7 करोड़ युवा हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है। इनमें से करीब 26.3 करोड़ युवा संभावित कार्यबल का हिस्सा हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या में शिक्षित युवा होने के बावजूद रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। 20 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में लगभग 6.3 करोड़ स्नातक युवाओं में से 1.10 करोड़ बेरोज़गार हैं।
कृषि की ओर लौटता कार्यबल
आर्थिक विकास के सामान्य सिद्धांत के अनुसार श्रमिकों का कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों से अधिक उत्पादकता वाले क्षेत्रों की ओर जाना प्रगति का संकेत होता है। लेकिन भारत में इसके उलट रुझान देखने को मिल रहा है। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में लोग गैर-कृषि क्षेत्रों को छोड़कर फिर से कृषि क्षेत्र की ओर लौट रहे हैं।
कोविड के बाद 2021-22 से 2023-24 के बीच देश में 8.2 करोड़ नए रोजगार जुड़े, जिनमें से लगभग 4 करोड़ कृषि क्षेत्र में ही सृजित हुए। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि बेहतर अवसरों के अभाव में लोग मजबूरी में कम आय वाले क्षेत्रों में लौट रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का एक बड़ा कारण ‘बिना वेतन वाले पारिवारिक श्रम’ और सीमित विकल्प हैं। स्वरोज़गार के नाम पर बढ़ रही गतिविधियां भी अक्सर जीविका चलाने का साधन मात्र हैं, न कि स्थायी आर्थिक प्रगति का संकेत।
शिक्षा के बावजूद घटता ‘स्किल प्रीमियम’
पिछले दशकों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ी है। कॉलेजों की संख्या में इजाफा हुआ और दाखिले भी बढ़े, लेकिन अब इसमें गिरावट देखी जा रही है। कई युवा आर्थिक कारणों से पढ़ाई बीच में ही छोड़ रहे हैं। सर्वेक्षणों में 70 प्रतिशत से अधिक युवाओं ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को इसका कारण बताया है।
स्थिति यह है कि बेरोज़गार युवाओं में 67 प्रतिशत स्नातक या उससे अधिक शिक्षित हैं, जबकि वेतनभोगी नौकरियों में केवल 6.7 प्रतिशत ही इतने शिक्षित हैं। इससे साफ है कि नौकरी बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच भारी असंतुलन है।
इसके चलते ‘स्किल प्रीमियम’ यानी उच्च शिक्षा का अतिरिक्त लाभ भी घटता जा रहा है। कई शिक्षित युवा कम कौशल वाली नौकरियां करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी आय और उम्मीद दोनों प्रभावित हो रही हैं।
घटती उम्मीदें, बढ़ती निराशा
देश में युवाओं की श्रम भागीदारी दर केवल 43 प्रतिशत है, यानी बड़ी संख्या में युवा न तो काम कर रहे हैं और न ही काम की तलाश में सक्रिय हैं। विशेषज्ञ इसे ‘हताशा का संकेत’ मानते हैं, जहां रोजगार की कम संभावनाओं के कारण युवा प्रयास करना भी छोड़ रहे हैं।
यह स्थिति भारत के ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। आने वाले वर्षों में कार्यशील आबादी का अनुपात अपने चरम पर होगा, लेकिन यदि रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बने तो यह अवसर एक बड़े संकट में बदल सकता है।
निष्कर्ष
शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई देश के विकास मॉडल पर सवाल खड़े करती है। जब तक उत्पादन संरचना में बदलाव कर उच्च कौशल वाले रोजगार नहीं बढ़ाए जाएंगे, तब तक शिक्षित बेरोज़गारी की समस्या और गहराती जाएगी। यह न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी गंभीर चुनौती बन सकती है।







