नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्टिंग को बड़ा झटका, बेलबाबा की वन भूमि का प्रस्ताव खारिज

हल्द्वानी में हाईकोर्ट परिसर बनाने की योजना पर फिर लगा ब्रेक, केंद्र की क्षेत्रीय समिति ने गैर-वन भूमि तलाशने के दिए निर्देश

मानस दर्पण 

नैनीताल/हल्द्वानी, 28 अक्टूबर 2026। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना को बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने हल्द्वानी के बेलबाबा-लामाचौड़ क्षेत्र में हाईकोर्ट परिसर बनाने के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। समिति ने कहा कि परियोजना के लिए गैर-वन भूमि के वैकल्पिक विकल्पों की पर्याप्त पड़ताल नहीं की गई। राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी को अब उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने के निर्देश दिए गए हैं।

30 हेक्टेयर वन भूमि और 123 पेड़ों का मामला

बेलबाबा क्षेत्र में प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर के निर्माण के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के उपयोग की अनुमति मांगी गई थी। इस परियोजना के लिए 123 पेड़ों के कटान का प्रस्ताव भी शामिल था। समिति ने वन भूमि के उपयोग से पहले वैकल्पिक गैर-वन भूमि की संभावनाओं की समुचित जांच नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई।

समिति के निर्णय से हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने की मौजूदा योजना आगे बढ़ाने में बाधा उत्पन्न हुई है।

गौलापार के बाद बेलबाबा का प्रस्ताव भी खारिज

हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी लाने के लिए इससे पहले गौलापार क्षेत्र में परिसर बनाने का प्रस्ताव भी मंजूर नहीं हुआ था। जनवरी 2024 में उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। गौलापार की योजना में बड़ी संख्या में पेड़ों के कटान को लेकर पर्यावरण संबंधी आपत्तियां सामने आई थीं।

अब बेलबाबा क्षेत्र का प्रस्ताव भी खारिज होने से हाईकोर्ट के लिए उपयुक्त भूमि तलाशना राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।

आखिर क्यों उठी थी शिफ्टिंग की मांग?

नैनीताल स्थित हाईकोर्ट परिसर में जगह की कमी, मुकदमों की बढ़ती संख्या, यातायात जाम और वादकारियों के आवास एवं यात्रा पर होने वाले खर्च को शिफ्टिंग के पक्ष में प्रमुख कारण बताया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या वर्ष 2010 के लगभग 4,000 से बढ़कर अब 64,000 से अधिक हो गई है।

हल्द्वानी में नया परिसर बनने से मैदानी क्षेत्रों से आने वाले वादकारियों को सुविधा मिलने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए वन भूमि संबंधी स्वीकृति और पर्यावरणीय नियमों का पालन आवश्यक है।

अब आगे क्या होगा?

क्षेत्रीय समिति ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी को गैर-वन भूमि के विकल्प तलाशने को कहा है। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार हाईकोर्ट परिसर के लिए नया स्थान चिह्नित करती है या किसी अन्य विकल्प पर विचार करती है।

फिलहाल इस निर्णय का अर्थ हाईकोर्ट की शिफ्टिंग योजना का स्थायी रूप से समाप्त होना नहीं है, बल्कि बेलबाबा की प्रस्तावित वन भूमि पर निर्माण की योजना को मंजूरी नहीं मिलना है। आगे की प्रक्रिया वैकल्पिक भूमि की उपलब्धता और आवश्यक स्वीकृतियों पर निर्भर करेगी।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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