यूजीसी की गाइडलाइन के विरोध में सवर्ण शक्ति संगठन का बिगुल, 21 को रामलीला मैदान से निकलेगी आक्रोश महारैली

हल्द्वानी, 18 फरवरी 2026। यूजीसी की नई गाइडलाइन को लेकर सियासी और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। बुधवार को सवर्ण शक्ति संगठन (उत्तराखंड) के संयोजक प्रकाश हर्बोला ने पत्रकार वार्ता कर गाइडलाइन को “काला कानून” बताते हुए इसका तीखा विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित प्रावधान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हैं और एकतरफा कार्रवाई का रास्ता खोलते हैं।

प्रकाश हर्बोला ने कहा कि यूजीसी की गाइडलाइन में ही भेदभाव निहित है। उनके अनुसार यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज हो जाती है तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई संभव है, लेकिन शिकायत झूठी साबित होने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ किसी दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। “जिस व्यक्ति पर आरोप लगेगा उसका करियर बर्बाद हो जाएगा, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?” उन्होंने सवाल उठाया।
उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि यदि भविष्य में मंत्री बदलते हैं तो क्या यही नीति जारी रहेगी। “कानून ऐसा नहीं होना चाहिए जो किसी एक वर्ग को पहले से दोषी मान ले,” उन्होंने कहा।
“समाज को बांटने का प्रयास”
हर्बोला ने आरोप लगाया कि गाइडलाइन के जरिए समाज को वर्गों में बांटने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के संदर्भ में एससी-एसटी के लिए दिशा-निर्देश बनाने की बात कही गई थी, लेकिन उसमें ओबीसी को भी जोड़ दिया गया, जो कोर्ट के आदेश का हिस्सा नहीं था। “कोर्ट ने ऐसी कोई गाइडलाइन नहीं दी थी कि शिकायतकर्ता झूठा पाए जाने पर भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो,” उन्होंने कहा।
उन्होंने पूर्व में बने विवादित विधेयकों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी दंगे में एक पक्ष को स्वतः दोषी मान लेने जैसी मानसिकता न्याय व्यवस्था के विपरीत है। “यहां भी यदि भेदभाव का आरोप लगे तो सवर्ण को ही दोषी मान लिया जाएगा, यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है?” उन्होंने प्रश्न किया।
अपील के प्रावधान पर भी सवाल
संगठन ने गाइडलाइन में प्रस्तावित ‘इक्विटी बोर्ड’ के ढांचे पर भी आपत्ति जताई। हर्बोला ने कहा कि बोर्ड के फैसलों के खिलाफ अपील का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जबकि देश की न्याय व्यवस्था में लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक अपील की बहुस्तरीय व्यवस्था है।
उन्होंने यह भी कहा कि इक्विटी बोर्ड में एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग सदस्य का प्रावधान है, लेकिन सवर्ण प्रतिनिधित्व का उल्लेख नहीं है, जिसे उन्होंने मौलिक अधिकारों का हनन बताया।
“शिक्षा संस्थान डर नहीं, संवाद के केंद्र हों”

सहसंयोजक भुवन भट्ट ने कहा कि संगठन किसी वर्ग के खिलाफ नहीं है, लेकिन ऐसी प्रणाली का विरोध करेगा जिसमें न्याय प्रक्रिया एकतरफा दिखाई दे। “शिक्षा संस्थान डर का नहीं, संवाद और ज्ञान का केंद्र होने चाहिए। हम मांग करते हैं कि नियमों पर पुनर्विचार कर सभी छात्रों के लिए समान और निष्पक्ष शिकायत तंत्र बनाया जाए,” उन्होंने कहा।
भट्ट ने कहा कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव की भावना बढ़ाना ठीक नहीं है। इससे जातीय तनाव बढ़ सकता है। “बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों के साथ स्वतंत्र वातावरण में पढ़ने दिया जाए,” उन्होंने कहा।
21 फरवरी को महारैली का ऐलान
संगठन ने 21 फरवरी को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में एकत्रित होकर आक्रोश महारैली निकालने का ऐलान किया है। यह रैली रामलीला मैदान से जिलाधिकारी कार्यालय तक जाएगी, जहां डीएम को ज्ञापन सौंपा जाएगा।
प्रकाश हर्बोला ने कहा, “हम सभी वर्गों का सम्मान करते हैं, लेकिन अधिकारों से समझौता नहीं करेंगे। यदि समाज को दबाने का प्रयास हुआ तो आवाज बुलंद की जाएगी। सरकार को समय रहते यूजीसी की इस गाइडलाइन को वापस लेना चाहिए।”
पत्रकार वार्ता में जगत सिंह बिष्ट, त्रिलोक सिंह बिष्ट, तरुण वानखेड़े, मनोज अग्रवाल, प्रताप जोशी और योगेंद्र भट्ट सहित अन्य सदस्य उपस्थित







