देवीधुरा में आठ मिनट तक बरसे पत्थर और फल-फूल, मां बाराही के जयकारों से गूंजा धाम

चार खाम-सात थोक के बग्वालियों ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा, दर्जनों घायल; बग्वाल खत्म होते ही गले मिलकर दिया भाईचारे का संदेश

देवीधुरा/चम्पावत। विश्व प्रसिद्ध मां बाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के पावन अवसर पर शुक्रवार को ऐतिहासिक बग्वाल का आयोजन हुआ। चार खाम-सात थोक के बग्वालियों के बीच खेली गई सदियों पुरानी पाषाण युद्ध की परंपरा को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचे। दोपहर 1:48 बजे शुरू हुई बग्वाल 1:55 बजे समाप्त हुई। करीब आठ मिनट तक बग्वाल मैदान में फल-फूल और पत्थरों की बरसात होती रही। इस दौरान मां बाराही के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंजता रहा।

बग्वाल के लिए वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया खामों के बग्वाली वीर पारंपरिक वेशभूषा में मैदान में उतरे। हाथों में मजबूत ढाल थामे बग्वालियों ने एक-दूसरे पर फल-फूल और पत्थर बरसाकर सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। देखते ही देखते बग्वाल मैदान रणभूमि में तब्दील हो गया।


ढालों की ओट में बरसते रहे पत्थर
बग्वाल शुरू होते ही दोनों पक्षों के बग्वाली वीरों ने ढालों की ओट लेकर एक-दूसरे पर पत्थर और फल-फूल बरसाने शुरू कर दिए। मैदान में मौजूद हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने। चारों ओर मां बाराही के जयकारे सुनाई देते रहे। कुछ ही देर में मैदान में पत्थरों और फल-फूल का ढेर लग गया।
बग्वाल की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचे थे। श्रद्धालुओं में बग्वाल को लेकर खासा उत्साह दिखाई दिया।
चोट लगी, फिर भी कम नहीं हुआ उत्साह
बग्वाल के दौरान दर्जनों बग्वाली वीरों और श्रद्धालुओं के चोटिल होने की सूचना रही। किसी के सिर पर चोट लगी तो किसी के शरीर के अन्य हिस्सों में पत्थर लगने से चोट आई। इसके बावजूद बग्वालियों और श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आई।
बग्वालियों का कहना था कि मां बाराही की बग्वाल में लगी चोट उनके लिए दर्द नहीं, बल्कि मां का आशीर्वाद है। इसी अटूट आस्था के चलते सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
बग्वाल खत्म होते ही गले मिले बग्वाली
करीब आठ मिनट तक चली बग्वाल के समाप्त होते ही मैदान का माहौल पूरी तरह बदल गया। जिन बग्वालियों के बीच कुछ देर पहले पत्थरों की बरसात हो रही थी, वही एक-दूसरे से गले मिले और भाईचारे एवं सौहार्द का संदेश दिया।
यही बग्वाल की सबसे खास परंपरा मानी जाती है। पाषाण युद्ध के बाद सभी बग्वाली एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव प्रकट करते हैं। इस दौरान बग्वाल के धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की भी अनूठी झलक देखने को मिली।
मुख्यमंत्री धामी ने मां बाराही की पूजा-अर्चना की
ऐतिहासिक बग्वाल में शामिल होने पहुंचे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मां बाराही के दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा की बग्वाल को उत्तराखंड की आस्था, लोकसंस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की अनूठी मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसकी विशिष्ट पहचान को संरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है।
देवीधुरा बनेगा नगर पंचायत क्षेत्र, 9.80 करोड़ से बनेगी बहुस्तरीय पार्किंग
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की घोषणा की। इसके साथ ही श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए करीब 9.80 करोड़ रुपये की लागत से बहुस्तरीय पार्किंग बनाए जाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित किए जाने के बाद इसकी गरिमा और महत्व और बढ़ा है। मेले में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए व्यवस्थाओं को लगातार बेहतर किया जा रहा है।
बहुस्तरीय पार्किंग के निर्माण से बग्वाल मेले के दौरान वाहनों की बढ़ती संख्या से होने वाली परेशानी कम होने और यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
महज पाषाण युद्ध नहीं, आस्था और सौहार्द की विरासत है बग्वाल
देवीधुरा की बग्वाल में फल-फूल और पत्थरों की बरसात के बीच निभाई जाने वाली यह परंपरा महज पाषाण युद्ध नहीं है। इसके पीछे मां बाराही के प्रति अटूट आस्था, सदियों पुरानी लोक परंपरा और सामाजिक एकता की गहरी भावना जुड़ी है।
बग्वाल शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक जहां मैदान में परंपरा का रोमांच दिखाई देता है, वहीं अंत में एक-दूसरे से गले मिलते बग्वालियों का दृश्य यह संदेश देता है कि संघर्ष के बाद भी समाज में प्रेम, भाईचारा और सौहार्द कायम रहना चाहिए।
इसी अनूठे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश के कारण देवीधुरा की बग्वाल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देशभर में अपनी अलग पहचान रखती है।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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