अंततः शांति विजयी, युद्ध पराजयी

सीजफायर के बाद थमी जंग की आंच, वैश्विक बाजार में लौटी रौनक, कूटनीति ने दिखाई ताकत

हल्द्वानी। लंबे समय से तनाव और टकराव के बीच झुलस रहे मध्य-पूर्व में आखिरकार शांति की किरण फूट पड़ी। आठ अप्रैल की सुबह अपने साथ एक बड़ा संदेश लेकर आई—ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच संघर्ष विराम (सीजफायर) की घोषणा ने युद्ध की विभीषिका पर विराम लगा दिया। इस घटनाक्रम ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को नई दिशा दी, बल्कि पूरी दुनिया को राहत की सांस लेने का मौका भी दिया।
युद्ध के दौरान जहां लाखों बम, ड्रोन और मिसाइलों की बारिश ने भारी तबाही मचाई, वहीं अब शांति समझौते ने उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं। जन-धन की व्यापक क्षति, प्रदूषण और बाधित व्यापार से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी इस फैसले से संजीवनी मिली है।
संघर्ष विराम की खबर आते ही शेयर बाजारों में जबरदस्त उछाल देखा गया। सोना-चांदी की कीमतों में तेजी आई, जबकि तेल, गैस और हीलियम जैसी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति फिर से सुचारु होने लगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव वैश्विक व्यापार के लिए सकारात्मक संकेत है।
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भूमिका भी चर्चा में रही। जहां एक ओर उन्होंने कड़े रुख के साथ बिना शर्त समर्पण की बात कही, वहीं अंततः कई शर्तों पर सहमति बनती नजर आई। हालांकि, सत्ता परिवर्तन जैसी कोई स्थिति नहीं बनी और न ही ऊर्जा संसाधनों पर सीधा नियंत्रण स्थापित हो सका।
ईरान ने विकेंद्रीकृत नेतृत्व और रणनीतिक संतुलन के जरिए अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। ‘प्रॉक्सी’ समूहों की सक्रियता के बावजूद उसने कूटनीतिक स्तर पर बढ़त हासिल की। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि सैन्य शक्ति से अधिक प्रभावी संवाद और संयम होता है।
इस दौरान बेंजामिन नेतन्याहू सहित कई पश्चिमी नेताओं की रणनीतियों पर भी सवाल उठे, जबकि यूरोपीय देशों और नाटो की भूमिका सीमित नजर आई। दूसरी ओर, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कूटनीतिक सक्रियता और पाकिस्तान की संतुलनकारी भूमिका भी चर्चा में रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष विराम केवल अस्थायी राहत नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व के लिए एक स्पष्ट संदेश है—स्थायी शांति के लिए आत्मनिर्भरता और संतुलित कूटनीति जरूरी है। ‘प्रॉक्सी’ युद्धों से दूर रहकर संप्रभुता को मजबूत करना ही क्षेत्रीय स्थिरता का आधार बन सकता है।
अंततः यह घटनाक्रम साबित करता है कि युद्ध चाहे कितना भी भयावह क्यों न हो, उसका अंत शांति की ओर ही जाता है। अहंकार और आक्रामकता भले कुछ समय के लिए हावी हों, लेकिन जीत हमेशा संवाद, संयम और शांति की ही होती है।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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