31 दिसंबर की रात और ‘कल’ की बीमारी: जब साल बदलता है, आदतें नहीं

31 दिसंबर की रात आते ही देशभर में एक अदृश्य बीमारी फैल जाती है—नाम है “कल पर टालना”। यह कोई रोग नहीं, बल्कि हमारी आदतों, झिझक और बहानों की पुरानी प्रवृत्ति है। इसी रात हम भविष्य में एक झूठा किराये का घर बना लेते हैं, जहाँ जिम्मेदारियों को ठुकराकर आराम से टाल दिया जाता है।

कोई कहता है, “कल से शराब छोड़ दूँगा।” लेकिन आज का गिलास, आज की हँसी और आज की खुशी—सारे संकल्प धुंध में घुल जाते हैं। आदतें जिंदा रहती हैं और इच्छाशक्ति को श्रद्धांजलि दे दी जाती है।
कोई बोलता है, “कल से मोबाइल कम चलाऊँगा।” और वही व्यक्ति चार स्टेटस, दो रील और एक लाइव वीडियो के साथ अपने ‘कल’ को सोशल मीडिया पर टांग देता है।
31 दिसंबर की रात घड़ी नहीं बदलती, सिर्फ बहाने अपडेट होते हैं। सबसे सुरक्षित वाक्य बन चुका है—“कल से मेहनत शुरू।” मगर यह ‘कल’ वह तारीख है जहाँ न कोई फाइल खुलती है, न कोई जिम्मेदारी पहुँचती है। सच तो यह है कि हम नया साल नहीं मनाते, बल्कि पुरानी नाकामियों को नया कैलेंडर भेंट कर देते हैं।
साल बदल जाता है, पर आदतें वही की वही रहती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जो सच में बदलना चाहता है, उसे तारीख की जरूरत नहीं होती। और जो तारीख पर टल-मटोल करता है, वह बदलता नहीं—बस अपनी आदतों को एक और मौका दे देता है।
31 दिसंबर की रात हमें यही याद दिलाती है कि संख्या बदलना आसान है, जीवन बदलना कठिन। अगर वाकई कुछ छोड़ना है, तो ‘कल’ का इंतजार छोड़िए—आज से शुरुआत कीजिए। हर नया साल हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन हर नया दिन एक नया अवसर बनकर जरूर आता है।
इस नववर्ष पर संकल्प लें—“कल नहीं, आज मैं बदलूंगा।” क्योंकि बदलाव तारीख से नहीं, फैसले से आता है।


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गणेश मेवाड़ी

संपादक - मानस दर्पण

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