सच की आवाज उठाते हुए दीपक बल्यूटिया ने कहा: “उत्तराखंड सरकार अगर जनता की हितैषी है तो फी एक्ट लागू करे, पुस्तक मूल्य में बेमानी अंतर पर उठाए सवाल!”

किताबों के खेल में उलझाकर सरकार किसका हित  साध रही है?

हल्द्वानी,  इंस्पिरेशन स्कूल के प्रबंधक श्री दीपक बल्यूटिया ने प्रशासन और शिक्षा विभाग द्वारा लगाए गए आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि यह आरोप पूरी तरह से निराधार और झूठे हैं। उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि, “विद्यालय द्वारा किसी भी अभिभावक को यह नहीं कहा गया है कि वह किताबें किसी विशेष विक्रेता से ही खरीदें। हम पूरी तरह से पारदर्शिता से काम कर रहे हैं।”


बल्यूटिया ने यह भी स्पष्ट किया कि, “पुस्तकों की सूची, जो उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार तैयार की गई है, उसे विद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर पहले से ही अपलोड कर दिया गया था ताकि अभिभावकों को कोई कठिनाई न हो।”
“उत्तराखंड में प्रकाशित पुस्तकों का मूल्य दिल्ली एनसीईआरटी से ज्यादा क्यों?”
दीपक बल्यूटिया ने किताबों के मूल्य में भारी अंतर पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि, “दिल्ली एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित एक किताब का मूल्य लगभग 65 रुपये है, जबकि उत्तराखंड में वही किताब दो गुने दामों में बिक रही है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्यों उत्तराखंड सरकार किताबों को ज्यादा दामों में प्रकाशित करवा रही है, जबकि दिल्ली में वही किताब आधे दाम में मिल रही है। यह सब कुछ संदिग्ध लगता है।”
“किताबों के इस अंतर में हो रहा है करोड़ों का घालमेल”
बल्यूटिया ने इस अंतर को लेकर गंभीर आरोप लगाया कि, “उत्तराखंड में जो किताबें प्राइवेट स्कूलों को बेची जा रही हैं, वह एनसीईआरटी से अनुमति प्राप्त नहीं हैं। अगर ऐसा नहीं है, तो फिर ये किताबें निजी विद्यालयों को खुले बाजार में क्यों बेची जा रही हैं? और क्यों प्रशासन/शिक्षा विभाग इन किताबों को जबरन निजी विद्यालयों में खरीदने का दबाव बना रहा है?”
यह सवाल उठाते हुए बल्यूटिया ने यह भी कहा कि “यह कोई सामान्य मुद्दा नहीं है, यह प्रदेश के शिक्षा प्रणाली के लिए एक गंभीर सवाल है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह इस खेल में किसका हित साध रही है।”
“फी एक्ट लागू करना जरूरी है, ताकि किताबों में पारदर्शिता बनी रहे”
साथ ही बल्यूटिया ने मांग की कि, “अगर सरकार उत्तराखंड की जनता की सच्ची हितैषी है तो उसे फी एक्ट को लागू करना चाहिए। इस काले खेल को रोकने के लिए सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए।”
उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि यह पूरा मामला न केवल राजस्व की हानि कर रहा है, बल्कि इससे शिक्षा प्रणाली में भी विश्वास की कमी पैदा हो रही है। अब समय आ गया है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले और उत्तराखंड के छात्रों और अभिभावकों के हित में ठोस कदम उठाए।


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गिरीश भट्ट

मुख्य संवाददाता - मानस दर्पण

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