गौ सेवा, संयम और साधना से युवाओं को राह दिखा रहे बाबा भवानी गिरी जी महाराज

भोग-विलास के दौर में सनातन मूल्यों की जीवंत मिसाल बने देहरादून के संत
हरिशंकर सिंह सैनी | देहरादून, उत्तराखंड
विशेष साक्षात्कार
आज के समय में जब भोग-विलास, दिखावा और तेज़ रफ्तार जीवनशैली ने समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी को मानसिक रूप से अस्थिर और दिशाहीन कर दिया है, तब ऐसे व्यक्तित्व समाज के लिए संबल बनकर सामने आते हैं, जो उपदेश से नहीं बल्कि अपने कर्मों से रास्ता दिखाते हैं। देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में नून नदी के तट पर स्थित संतोषी माता गौशाला, वहीं स्थापित एकादश मुखी हनुमान मंदिर और वर्षों से निरंतर चल रही निःस्वार्थ गौ सेवा इसी कर्मयोग की जीवंत मिसाल हैं।
इन सभी सेवाओं के केंद्र में हैं बाबा भवानी गिरी जी महाराज, जिन्होंने सनातन धर्म को केवल पूजा-पाठ और अनुष्ठानों तक सीमित न रखकर उसे करुणा, सेवा, संयम और संतुलित जीवन से जोड़ा है। सड़कों पर तड़पती गोमाता से लेकर भटकती युवा पीढ़ी तक, बाबा का प्रयास है कि हर पीड़ा को धर्म के सहारे राहत मिले।
बिना किसी सरकारी सहायता के, सीमित संसाधनों में गौशाला का संचालन, बीमार व दुर्घटनाग्रस्त गोवंश का उपचार और युवाओं को सेवा से जोड़ना—बाबा भवानी गिरी जी के लिए यह सब केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि उनकी साधना का ही विस्तार है। वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सिंह ने बाबा भवानी गिरी जी महाराज से विस्तार से संवाद किया। प्रस्तुत हैं इस विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश—
‘सेवा के बिना पूजा अधूरी है’
प्रश्न : बाबा जी, सनातन धर्म की सेवा में आने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर :
सनातन धर्म कोई अचानक अपनाने की वस्तु नहीं, यह संस्कारों से जीवन में उतरता है। बचपन से ही परिवार में पूजा-पाठ और साधु-संतों का सम्मान रहा, लेकिन जीवन की असली दिशा तब मिली जब समाज की पीड़ा को करीब से देखा।
1990 के दशक में मां संतोषी माता मंदिर की स्थापना के समय मैंने सड़कों पर घायल और तड़पती गोमाताओं को देखा। वह दृश्य मन को भीतर तक झकझोर गया। उसी दिन निश्चय किया कि पूजा के साथ सेवा भी करूंगा। मां संतोषी माता की कृपा से मार्ग मिला और हनुमान जी की भक्ति से शक्ति। यही तीनों—गौ सेवा, माता की साधना और हनुमान भक्ति—मेरे जीवन की धुरी बन गए।
‘धर्म जीवन को रोकता नहीं, दिशा देता है’
प्रश्न : भोग-विलास के इस दौर में धर्म की भूमिका क्या है?
उत्तर :
धर्म जीवन से भागने का नाम नहीं है। वह सही और गलत का फर्क सिखाता है। भोग अगर सीमित हो तो जीवन का हिस्सा है, लेकिन जब वही लक्ष्य बन जाए, तो विनाश तय है।
धर्म संयम और शांति देता है। वह समझाता है कि पैसा और पद साधन हैं, साध्य नहीं। आज जब हर ओर भटकाव है, तब धर्म दीपक की तरह रास्ता दिखाता है।
‘युवा मूल से कट रहा है, इसलिए भटक रहा है’
प्रश्न : युवा पीढ़ी सनातन मार्ग से दूर क्यों हो रही है?
उत्तर :
संस्कारों की कमी और दिखावे की संस्कृति इसका बड़ा कारण है। सोशल मीडिया पर जो दिखता है, वही सच मान लिया जाता है।
युवाओं को यह सिखाया जा रहा है कि ऐश और पैसा ही सफलता है, लेकिन कोई नहीं बताता कि इसके बाद खालीपन आता है। जब आत्मा भूखी रह जाती है, तो नशा और गलत संगत रास्ता बन जाते हैं।
‘सेवा से ही धर्म की शुरुआत होती है’
प्रश्न : युवाओं को जोड़ने के लिए आप क्या कर रहे हैं?
उत्तर :
हम धर्म थोपते नहीं, उदाहरण देते हैं। कई युवा गौशाला में केवल देखने आते हैं, फिर सेवा करते-करते बदल जाते हैं।
जब कोई युवा अपने हाथ से घायल गाय को पानी पिलाता है, उसी क्षण उसके भीतर करुणा जागती है। वहीं से धर्म की शुरुआत होती है।
‘गौ सेवा सबसे कठिन, लेकिन सबसे पवित्र सेवा’
प्रश्न : आज के समय में गौ सेवा कितनी चुनौतीपूर्ण है?
उत्तर :
यह सबसे कठिन सेवा है क्योंकि इसमें लाभ नहीं, केवल जिम्मेदारी है। चारा, दवाइयां और इलाज—सब महंगा है।
हम बिना सरकारी सहायता के काम कर रहे हैं। कई बार संकट आता है, लेकिन सेवा नहीं रुकती। उद्देश्य पवित्र हो तो रास्ता निकल ही आता है।
‘संतोष ही जीवन की सबसे बड़ी औषधि’
प्रश्न : मां संतोषी माता की पूजा जीवन को कैसे संतुलित करती है?
उत्तर :
आज सबसे बड़ी बीमारी असंतोष है। मां संतोषी माता सिखाती हैं कि जो मिला है, उसमें संतोष रखो।
जब संतोष आ जाता है, तो आधी परेशानियां खुद खत्म हो जाती हैं।
‘हनुमान साधना से मिलता है आत्मबल’
प्रश्न : एकादश मुखी हनुमान साधना का प्रभाव क्या है?
उत्तर :
हनुमान जी शक्ति और संयम के प्रतीक हैं। उनकी साधना मन को मजबूत बनाती है।
मंत्र कोई जादू नहीं, अनुशासन है। जब अनुशासन आता है, तो वासना अपने आप पीछे हट जाती है।
‘मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, संस्कार केंद्र है’
प्रश्न : मंदिर के माध्यम से समाज में क्या परिवर्तन दिख रहा है?
उत्तर :
यहां कई युवा नशा छोड़कर सेवा और परिवार से जुड़े हैं। यह चमत्कार नहीं, प्रक्रिया है।
धर्म समय लेता है, लेकिन स्थायी परिवर्तन देता है।
‘भविष्य की दिशा’
प्रश्न : आगे की योजनाएं क्या हैं?
उत्तर :
गौशाला का विस्तार, युवाओं के लिए सेवा शिविर, संस्कार शिक्षा और साधना केंद्र।
हम चाहते हैं कि युवा मंदिर को डर से नहीं, प्रेम से जोड़ें।
‘सेवा, साधना और संयम—यही सनातन जीवन’
प्रश्न : युवाओं और भक्तों के लिए संदेश?
उत्तर :
भोग को छोड़ो मत, उस पर नियंत्रण रखो।
सेवा, साधना और संयम—यही सनातन जीवन है।
निष्कर्ष
बाबा भवानी गिरी जी महाराज का जीवन और विचार यह स्पष्ट करते हैं कि सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संतुलित और करुणामयी कला है। गौ सेवा, मां संतोषी माता की भक्ति और हनुमान साधना के माध्यम से वे युवाओं को भोग-विलास से निकालकर सेवा, संयम और शांति के मार्ग पर ले जाने का सतत प्रयास कर रहे हैं।


Advertisements

गिरीश भट्ट

मुख्य संवाददाता - मानस दर्पण

You cannot copy content of this page